Ravan-Sita Samvad Sunna

रावण-सीता संवाद सुनना

Ravan-Sita Samvad Sunna

अशोक वाटिका में जब हनुमान जी वृक्ष की घनी शाखाओं में छिपकर सीता माता के दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे थे, तभी बड़े गर्व और अहंकार के साथ रावण वहाँ आ पहुँचा। वह अनेक रानियों और सेविकाओं से घिरा हुआ था और उसके मुख पर घमंड का भाव था। हनुमान जी ने अपने को और भी छिपा लिया और ध्यानपूर्वक उस संवाद को सुनने लगे, ताकि सीता जी की मनःस्थिति और रावण की नीयत दोनों को समझ सकें।

रावण ने मीठे और चापलूसी भरे वचनों से सीता जी को अपनी ओर करने का प्रयास किया। उसने अपने बल, अपने वैभव, अपनी नगरी की सम्पन्नता और अपनी अनेक विजयों का बखान किया। उसने कहा कि श्रीराम तो एक साधारण वनवासी हैं, जो इस विशाल समुद्र को पार कर लंका तक कभी नहीं आ सकते। उसने सीता जी को महारानी बनने और सारे सुख भोगने का प्रलोभन दिया।

परंतु सीता जी ने रावण के इन सब वचनों की तनिक भी परवाह नहीं की। उन्होंने अपने और रावण के बीच एक तिनका रख दिया और अत्यन्त दृढ़ता से कहा कि जैसे सूर्य के प्रकाश को कोई जुगनू नहीं छू सकता, वैसे ही श्रीराम के समक्ष तेरा कोई मूल्य नहीं। मेरा शरीर, मन और प्राण केवल प्रभु श्रीराम के हैं और रहेंगे। तेरे प्रलोभन और तेरी सम्पत्ति मेरे लिए तिनके के समान तुच्छ हैं।

सीता जी की इस निर्भीकता और अटल पातिव्रत्य को देखकर रावण क्रोध से जल उठा। उसने भयंकर रूप धारण कर सीता जी को अनेक प्रकार से डराया-धमकाया और कहा कि यदि उन्होंने उसकी बात न मानी तो कुछ ही समय में उन्हें गंभीर दण्ड दिया जाएगा। उसने राक्षसियों को आज्ञा दी कि वे सीता जी को भाँति-भाँति से भयभीत करके उसे अपनी ओर झुकाने का प्रयास करें।

रावण के इन क्रूर वचनों को सुनकर वृक्ष पर छिपे हनुमान जी का हृदय क्रोध से भर उठा। उनका मन हुआ कि इसी क्षण नीचे उतरकर इस अभिमानी रावण को दण्ड दें। परंतु उन्होंने अपने विवेक से क्रोध को रोक लिया, क्योंकि वे जानते थे कि उनका मुख्य कार्य माता को संदेश देना और उनकी दशा प्रभु तक पहुँचाना है, न कि समय से पहले युद्ध छेड़ना।

रावण के चले जाने के बाद, सीता जी की व्याकुलता और भी बढ़ गई और वे प्रभु-वियोग में और भी दुःखी हो गईं। हनुमान जी ने यह सारा संवाद सुनकर माता के अटल प्रेम और रावण के अंधे अहंकार, दोनों को भली-भाँति समझ लिया। अब उन्हें और भी दृढ़ विश्वास हो गया कि इस अधर्मी रावण का विनाश निश्चित है।

भाव — अहंकारी की वाणी कितनी भी बड़ी हो, सत्य और सतीत्व के आगे टिक नहीं पाती; धर्म पर अडिग रहना ही सच्ची विजय है।

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