
रावण को उपदेश
Ravan Ko Updesh
अपनी पूँछ के ऊँचे आसन पर विराजमान होकर हनुमान जी ने रावण को समझाने का निश्चय किया। यद्यपि रावण अभिमान से भरा हुआ था, फिर भी हनुमान जी ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए, उसे धर्म और नीति का उपदेश देना उचित समझा। उन्होंने अत्यन्त गंभीर और विवेकपूर्ण वाणी में रावण को उसके भले-बुरे का बोध कराना आरम्भ किया।
हनुमान जी ने कहा कि हे रावण, तुम इतने विद्वान, बलशाली और महान कुल में उत्पन्न होकर भी परस्त्री का हरण कर, अपने ज्ञान और तप को कलंकित कर रहे हो। जिस लक्ष्मी और वैभव पर तुम्हें इतना अभिमान है, वह अधर्म के मार्ग पर चलने से स्थिर नहीं रहती। तुम्हारा यह अहंकार तुम्हें और तुम्हारे सारे कुल को विनाश की ओर ले जाएगा।
हनुमान जी ने रावण को श्रीराम की महिमा बताई कि वे साक्षात् परमेश्वर के अवतार हैं, जो दुष्टों के संहार और साधुओं की रक्षा के लिए इस धरा पर आए हैं। उन्होंने कहा कि जिनके एक दूत का बल तूने आज देख लिया, उन प्रभु के प्रकोप के सामने तेरी सारी सेना, तेरे सारे अस्त्र और तेरा सारा वैभव क्षण भर में नष्ट हो जाएगा।
हनुमान जी ने रावण को सच्चे हित की बात बताते हुए कहा कि अब भी समय है, तुम अपने अपराध का प्रायश्चित करो। सीता माता को पूरे सम्मान के साथ श्रीराम को लौटा दो और उनकी शरण में चले जाओ। प्रभु श्रीराम अत्यन्त करुणामय और क्षमाशील हैं; यदि तुम शरणागत हो जाओ, तो वे तुम्हारे सारे अपराध क्षमा कर देंगे और तुम्हारा कल्याण होगा।
परंतु अहंकार से अंधे हुए रावण ने हनुमान जी के इन हितकारी वचनों को अपमान समझा। उसका मन क्रोध से भर उठा और उसने हनुमान जी के इस उपदेश की खिल्ली उड़ाई तथा और भी अधिक क्रोधित होकर उन्हें दण्ड देने पर उतारू हो गया। जिसका विनाश निकट होता है, उसे हितकारी वचन भी कड़वे और असह्य लगते हैं — रावण की यही दशा थी।
हनुमान जी ने देख लिया कि रावण अपने अहंकार में इतना डूबा है कि उसे कोई भी उपदेश ग्रहण नहीं होगा और उसका विनाश अब अवश्यंभावी है। फिर भी, एक धर्मदूत के रूप में हनुमान जी ने अपना कर्तव्य पूर्ण किया और सत्य का मार्ग दिखाने में कोई कसर न छोड़ी। यह उनके धर्मपरायण और परोपकारी स्वभाव का परिचायक था।
भाव — सच्चा भक्त शत्रु को भी सन्मार्ग दिखाता है; परंतु अहंकारी को हित की बात भी विष लगती है और वही उसके नाश का कारण बनती है।