
रावण की सभा में पूँछ का आसन
Ravan Ki Sabha Mein Poonch Ka Aasan
मेघनाद हनुमान जी को बंदी बनाकर रावण की भरी सभा में ले आया। वह सभा स्वर्ण और रत्नों से जगमगा रही थी, जिसमें बड़े-बड़े राक्षस योद्धा, मंत्री और सेनापति बैठे थे। सिंहासन पर बैठा दस सिरों वाला रावण अपने अहंकार और तेज से चमक रहा था। हनुमान जी को उस विशाल दरबार में लाया गया, परंतु उनके मुख पर तनिक भी भय अथवा दीनता का भाव न था।
रावण ने हनुमान जी को घमंड भरी दृष्टि से देखा और पूछा कि तू कौन है, किसका दूत है और किसकी आज्ञा से मेरी नगरी में यह उत्पात मचाया है। हनुमान जी ने निर्भीक होकर उत्तर दिया कि वे कोसलनरेश श्रीराम के दूत हैं और उन्हीं की आज्ञा से यहाँ आए हैं। उन्होंने रावण को यह भी स्मरण कराया कि प्रभु श्रीराम की शक्ति के आगे उसकी सारी लंका तिनके के समान है।
हनुमान जी ने रावण को समझाते हुए कहा कि वह सीता माता को सम्मानपूर्वक श्रीराम को लौटा दे, तभी उसका कल्याण है, अन्यथा उसके अभिमान का अंत निश्चित है। हनुमान जी के इन साहसी और सत्य वचनों को सुनकर रावण क्रोध से आग-बबूला हो गया। उसने अपने एक दूत को इतने निर्भय होते देखकर उसका वध करने की आज्ञा दे दी।
तभी सभा में उपस्थित विभीषण ने रावण को नीति की याद दिलाई कि किसी दूत का वध करना राजधर्म के विरुद्ध है और अनुचित है। दूत को दण्ड तो दिया जा सकता है, परंतु उसे प्राणदण्ड देना कुल की परंपरा और नीति के विरुद्ध होगा। विभीषण के समझाने पर रावण ने अपना निर्णय बदला और सोचा कि इस वानर को अपमानित करके ही छोड़ा जाए।
रावण ने आज्ञा दी कि इस वानर की पूँछ में कपड़ा लपेटकर, तेल में भिगोकर आग लगा दी जाए, क्योंकि वानरों को अपनी पूँछ अत्यन्त प्रिय होती है और इससे उसका उपहास होगा। इसी बीच, जब हनुमान जी को बैठने के लिए कोई आसन नहीं दिया गया और सभा में उनका अपमान करने का प्रयास हुआ, तब हनुमान जी ने अपनी युक्ति से अपनी ही पूँछ को कुण्डली की भाँति लपेटकर, रावण के सिंहासन से भी ऊँचा आसन बना लिया।
उस ऊँचे पूँछ-आसन पर बैठकर हनुमान जी रावण से भी ऊँचे विराजमान हो गए। यह देखकर सारी सभा चकित रह गई और रावण का अहंकार भीतर ही भीतर आहत हुआ। हनुमान जी ने इस युक्ति से यह प्रकट कर दिया कि प्रभु श्रीराम का दूत किसी के सामने न झुकता है, न नीचा बैठता है, बल्कि सत्य और धर्म सदा ऊँचे ही रहते हैं।
भाव — सत्य का सेवक अपमान के प्रयास को भी अपने तेज से गौरव में बदल देता है; धर्म सदा अधर्म से ऊँचा ही रहता है।