Ravan Ke Putron Aur Senapatiyon Se Yuddh

रावण के पुत्रों और सेनापतियों से हनुमान जी का युद्ध

Ravan Ke Putron Aur Senapatiyon Se Yuddh

लंका के महासंग्राम में जब दोनों ओर से भीषण युद्ध छिड़ा, तब रावण ने अपने बलशाली पुत्रों और महारथी सेनापतियों को एक-एक करके रणभूमि में उतारा। ये सभी अपने-अपने बल, माया और शस्त्र-कौशल में प्रवीण थे, और वानर सेना के लिए इनका सामना करना अत्यंत कठिन था। ऐसे प्रत्येक विकट अवसर पर हनुमान जी अग्रणी होकर मोर्चा सँभालते और अपने अपार पराक्रम से शत्रुओं को परास्त करते थे।

रावण के अनेक वीर सेनापति — धूम्राक्ष, अकम्पन, देवांतक, नरांतक जैसे महाबली राक्षस — जब वानर सेना पर टूट पड़े, तब हनुमान जी ने बिना किसी शस्त्र के, केवल अपने विशाल भुजबल और पर्वत-समान शिलाओं से उनका सामना किया। कहा जाता है कि नरांतक जैसे बलशाली राक्षस का सामना अंगद और अन्य वीरों के साथ मिलकर हुआ, किंतु हनुमान जी की उपस्थिति सदा सेना के लिए संबल बनी रही और उन्होंने अनेक प्रबल राक्षसों को अपने मुष्टि-प्रहार से धराशायी कर दिया।

हनुमान जी की युद्ध-शैली अद्भुत थी। वे कभी किसी वृक्ष को उखाड़कर शत्रुओं पर प्रहार करते, कभी विशाल शिला उठाकर उनकी सेना को तितर-बितर कर देते, और कभी अपने विराट रूप से शत्रु-सेना में भय उत्पन्न कर देते। उनके प्रहार में क्रोध नहीं, अपितु धर्म की रक्षा का दृढ़ संकल्प था। वे युद्ध को केवल विजय का साधन नहीं, अपितु प्रभु श्रीराम के धर्म-कार्य की सेवा मानते थे।

जब-जब कोई राक्षस माया का प्रयोग कर वानर सेना को भ्रमित करने का प्रयास करता, तब हनुमान जी अपने विवेक और बल से उस माया को छिन्न-भिन्न कर देते। उनकी उपस्थिति मात्र से वानर वीरों का उत्साह द्विगुणित हो जाता और शत्रु के हृदय में भय व्याप्त हो जाता। अनेक बार जब कोई वानर घायल होकर संकट में पड़ता, तब हनुमान जी तत्काल वहाँ पहुँचकर उसकी रक्षा करते और उसे युद्धभूमि से सुरक्षित निकाल लाते।

हनुमान जी सदा यह स्मरण रखते थे कि विजय का समस्त श्रेय प्रभु श्रीराम को ही है। इसीलिए वे कभी अपने पराक्रम का अभिमान नहीं करते थे, अपितु प्रत्येक शत्रु के परास्त होने पर प्रभु का जयघोष करते थे। उनकी यह विनम्रता ही उनके अपार बल को और भी तेजस्वी बना देती थी। रावण के पुत्र और सेनापति चाहे कितने भी बलशाली क्यों न रहे हों, हनुमान जी की भक्ति और पराक्रम के समक्ष उनका बल क्षीण पड़ जाता था।

इस प्रकार हनुमान जी ने रावण के अनेक पुत्रों और सेनापतियों के आक्रमण से वानर सेना और श्रीराम के धर्म-कार्य की रक्षा की। यह प्रसंग इस भाव का बोध कराता है कि जिसका बल भक्ति से जुड़ा हो और जिसका पराक्रम विनम्रता से मंडित हो, उसकी विजय सुनिश्चित होती है।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Samudra Setu Nirman Mein Hanuman Ka Yogdan

समुद्र सेतु निर्माण में हनुमान जी का योगदान

Lanka Yuddh Kaal
Ram Ki Sena Mein Hanuman Ka Senapati Karya

राम की सेना में हनुमान जी का सेनापति कार्य

Lanka Yuddh Kaal
Lakshman Ki Murchha Aur Sanjivani Booti

लक्ष्मण की मूर्च्छा और संजीवनी बूटी — द्रोणगिरि पर्वत उठाना

Lanka Yuddh Kaal
Bharat Ka Baan Aur Hanuman Ka Ayodhya Mein Utarna

भरत का बाण और हनुमान जी का अयोध्या में उतरना

Lanka Yuddh Kaal
Kalnemi Vadh — Ravan Ka Chhal

कालनेमि वध — रावण का छल और हनुमान जी की सतर्कता

Lanka Yuddh Kaal
Makardhwaj Ki Katha

मकरध्वज की कथा — पसीने से जन्मे पुत्र से युद्ध

Lanka Yuddh Kaal