
राम की विजय और अयोध्या तक विजय-समाचार पहुँचाना
Ram Ki Vijay Aur Ayodhya Samachar Pahunchana
अंततः वह शुभ घड़ी आई जब श्रीराम ने अपने दिव्यास्त्रों से महाबली रावण का अंत कर दिया और धर्म पर छाया अधर्म का अंधकार पूर्णतः मिट गया। लंका विजय के साथ ही सीता माता को बंधन से मुक्ति मिली और अग्नि-परीक्षा से उनकी पवित्रता समस्त संसार के समक्ष प्रकट हुई। विभीषण को लंका का राजा नियुक्त किया गया, और चौदह वर्ष के वनवास की अवधि भी अब पूर्ण होने को थी। समस्त सृष्टि में आनंद और मंगल की लहर दौड़ गई।
जब श्रीराम सीता माता, लक्ष्मण और समस्त सेना के साथ पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या की ओर प्रस्थान करने लगे, तब उनके मन में एक चिंता थी। वे जानते थे कि अयोध्या में भरत जी उनके वियोग में तपस्वी जीवन बिता रहे हैं और नंदिग्राम में प्रतिदिन उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि नियत समय पर प्रभु न पहुँचे तो भरत जी अपने प्राण त्यागने की प्रतिज्ञा कर चुके थे। इस संकट की घड़ी में प्रभु ने पुनः अपने सबसे विश्वसनीय भक्त हनुमान जी को स्मरण किया।
श्रीराम ने हनुमान जी को आज्ञा दी कि वे अयोध्या पहुँचकर भरत जी को विजय का शुभ समाचार दें और यह सूचित करें कि प्रभु सकुशल लौट रहे हैं। इस अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व को पाकर हनुमान जी का हृदय आनंद से भर उठा, क्योंकि जिस मिलन के लिए यह समस्त संग्राम हुआ था, उसका शुभ संदेश देने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ था। वे तत्काल विमान से पूर्व ही आकाश-मार्ग से अयोध्या की ओर उड़ चले।
नंदिग्राम पहुँचकर हनुमान जी ने देखा कि भरत जी जटा-वल्कल धारण किए, तपस्वी वेश में, प्रभु के आगमन की व्याकुलता से क्षीण होकर बैठे हैं और श्रीराम की चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर उनकी सेवा कर रहे हैं। हनुमान जी ने विनम्रता से भरत जी को प्रणाम किया और उन्हें प्रभु की विजय, रावण-वध, सीता माता के उद्धार और सकुशल आगमन का समस्त शुभ समाचार सुनाया।
यह समाचार सुनते ही भरत जी के हर्ष का पारावार न रहा। जो शरीर वियोग में सूख चला था, वह प्रभु के आगमन के समाचार मात्र से पुनः जीवंत हो उठा। उन्होंने बार-बार हनुमान जी को हृदय से लगाया और इस मंगल संदेश को लाने के लिए उन्हें अपना परम उपकारी बताया। समस्त अयोध्या नगरी को सजाया गया, मार्ग बुहारे गए, तोरण बाँधे गए, और प्रभु के स्वागत की भव्य तैयारियाँ आरंभ हो गईं।
जब श्रीराम, सीता माता और लक्ष्मण जी सहित अयोध्या पहुँचे, तब समस्त नगरी आनंद-मग्न हो उठी और भरत जी ने प्रभु के चरणों में गिरकर वियोग का समस्त ताप शांत किया। इस समस्त मंगलमय मिलन के मूल में हनुमान जी का वह विजय-संदेश था। यह प्रसंग इस भाव को प्रकट करता है कि प्रभु का शुभ संदेश जन-जन तक पहुँचाने वाला भक्त स्वयं भी उस आनंद का सहभागी बन जाता है, और यही सेवा उसे प्रभु का सदा-सर्वदा प्रिय बना देती है।