
कंस वध और उग्रसेन का राज्याभिषेक
Kans Vadh Aur Ugrasen Ka Rajyabhishek
अखाड़े में अपने बलशाली मल्लों को गिरता देखकर कंस भय और क्रोध से पागल हो उठा। उसने कठोर स्वर में आदेश दिया कि इन दोनों ग्वाल-बालकों को यहाँ से निकाल दो, इनकी संपत्ति छीन लो, दुष्ट नंद को बंदी बना लो और वसुदेव तथा अपने पिता उग्रसेन का भी वध कर डालो। कंस के इन अधर्मपूर्ण और कृतघ्न वचनों को सुनकर श्रीकृष्ण का धैर्य टूट गया और अब उनके अवतार का प्रमुख प्रयोजन पूर्ण होने का समय आ गया।
श्रीकृष्ण एक ही छलाँग में उस ऊँचे मंच पर जा पहुँचे, जहाँ कंस अपने सिंहासन पर बैठा था। कंस के काल को इस प्रकार निकट आते देख वह घबराकर उठ खड़ा हुआ और अपनी तलवार तथा ढाल सँभालने लगा। किंतु इससे पहले कि वह कुछ कर पाता, श्रीकृष्ण ने उसके सिर से मुकुट गिरा दिया और उसके केश पकड़कर उसे मंच से नीचे अखाड़े की भूमि पर पटक दिया।
तत्पश्चात सर्वशक्तिमान श्रीकृष्ण स्वयं उस पापी कंस के ऊपर कूद पड़े। जिस कंस के भय से कभी सारा मथुरा और व्रज काँपता था, जिसने अनेक नवजात शिशुओं की हत्या की और देवकी-वसुदेव को वर्षों कारागार में यातनाएँ दीं, उसी अधर्मी का अंत भगवान के करकमलों से हो गया। कंस का प्राणांत होते ही उसके पापों का बोझ धरती से उतर गया और चारों ओर शांति की लहर दौड़ गई।
कंस के मरते ही उसके आठ भाई क्रोध से भरकर बदला लेने दौड़े, किंतु बलराम ने अपनी गदा के प्रहार से उन सभी को अधर्म के दंड-स्वरूप शांत कर दिया, जैसे सिंह हरिणों के झुंड को तितर-बितर कर देता है। इस प्रकार अत्याचार और अधर्म का समूल नाश हो गया। आकाश से देवताओं ने पुष्प-वर्षा की, गंधर्व गान करने लगे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।
कंस-वध के पश्चात श्रीकृष्ण ने सबसे पहले कारागार में जाकर अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव को मुक्त किया। फिर उन्होंने कंस द्वारा बंदी बनाए गए अपने नाना उग्रसेन को कारागार से निकाला। यद्यपि यदुवंश का राज्य स्वयं श्रीकृष्ण को प्राप्त हो सकता था, तथापि विनम्र भगवान ने राजगद्दी स्वीकार नहीं की। उन्होंने धर्म की मर्यादा रखते हुए अपने वृद्ध और धर्मात्मा नाना उग्रसेन को पुनः मथुरा के सिंहासन पर बैठाया और उनका राज्याभिषेक करवाया।
श्रीकृष्ण ने उग्रसेन से कहा कि हे महाराज, आप ययाति के शाप के कारण यदुवंश में राजा तो नहीं कहलाएँगे, फिर भी आप ही हमारे स्वामी हैं, हम सब आपकी आज्ञा में रहेंगे। इस प्रकार मथुरा में पुनः धर्म और न्याय का राज्य स्थापित हो गया, तथा प्रजा वर्षों बाद निर्भय होकर सुख-शांति से रहने लगी।
इस लीला की महिमा यही है कि भगवान अधर्म का नाश और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ही अवतार लेते हैं। कंस-वध अन्याय पर धर्म की विजय है, और उग्रसेन का राज्याभिषेक भगवान की विनम्रता तथा मर्यादा-पालन का दिव्य आदर्श प्रस्तुत करता है। प्रभु कभी सत्ता के लोभी नहीं होते; वे तो केवल धर्म की रक्षा करते हैं।