
पूँछ में आग और लंका दहन
Poonch Mein Aag Aur Lanka Dahan
रावण ने अपने अभिमान में आकर आज्ञा दी कि हनुमान जी की पूँछ में कपड़ा लपेटकर, उसे तेल में भिगोकर आग लगा दी जाए, ताकि इस वानर का उपहास हो और वह अपमानित होकर लौटे। राक्षस सैनिकों ने हनुमान जी की पूँछ में पुराने वस्त्र लपेटने आरम्भ किए। हनुमान जी ने इसे भी प्रभु की एक लीला समझकर स्वीकार कर लिया और मन ही मन एक नई योजना बना ली।
हनुमान जी ने युक्तिपूर्वक अपनी पूँछ को लम्बा करना आरम्भ कर दिया। राक्षस जितना वस्त्र लपेटते, हनुमान जी उतनी ही पूँछ और बढ़ा लेते। लंका का सारा कपड़ा, तेल और घी उस पूँछ को लपेटने में समाप्त होने लगा। अंततः जब पूँछ में आग लगाई गई, तो हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम का स्मरण किया और अग्नि से प्रार्थना की कि वह उन्हें कष्ट न दे, बल्कि शीतल बनी रहे।
आग लगते ही हनुमान जी ने भयंकर गर्जना की और अपना विशाल रूप धारण कर बंधन तोड़ डाले। जलती हुई पूँछ को लेकर वे रावण की सभा से बाहर निकल आए और छलाँग लगाते हुए एक भवन से दूसरे भवन पर कूदने लगे। जहाँ-जहाँ वे जाते, वहाँ-वहाँ अग्नि लगती चली गई। देखते ही देखते स्वर्णमयी लंका की छतें और भवन धू-धू कर जलने लगे।
हनुमान जी ने रावण के राजभवन से लेकर बड़े-बड़े राक्षसों के महलों तक, प्रायः सारी लंका को अग्नि की लपटों में समेट लिया। चारों ओर हाहाकार मच गया, राक्षस-परिवार भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। यह अग्नि रावण के उस अहंकार का ही परिणाम थी, जो उसने एक निर्दोष दूत को अपमानित करने के प्रयास में उत्पन्न की थी। हनुमान जी के बल और तेज के आगे सारी लंका विवश हो गई।
इस विध्वंस के बीच हनुमान जी ने विशेष ध्यान रखा कि विभीषण का भवन, जो प्रभु के भक्त का घर था, अग्नि से सुरक्षित रहे, और उसे कोई हानि न पहुँची। साथ ही, उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि जिस अशोक वृक्ष के नीचे माता सीता विराजमान थीं, वह स्थान इस अग्निकांड से पूर्णतः सुरक्षित रहे। उनका उद्देश्य केवल अधर्मियों को दण्ड देना था, निर्दोषों को नहीं।
लंका को जलते देख हनुमान जी के मन में एक क्षण को शंका हुई कि कहीं इस अग्नि में माता सीता को कोई कष्ट तो नहीं पहुँचा। परंतु आकाशवाणी और अपने विवेक से उन्हें आश्वस्ति हुई कि जो अग्नि रावण की लंका को भस्म कर रही है, वह पतिव्रता सीता का बाल भी बाँका नहीं कर सकती। यह जानकर हनुमान जी निश्चिन्त हुए और प्रभु का स्मरण करते रहे।
भाव — अधर्मी का अहंकार ही उसके विनाश की अग्नि बनता है; प्रभु का दूत निर्दोषों की रक्षा करते हुए दुष्टों का दमन करता है।