Paundrak Vasudev Vadh — Nakli Krishna

पौंड्रक वासुदेव वध — नकली कृष्ण

Paundrak Vasudev Vadh — Nakli Krishna

करुष देश का राजा पौंड्रक अत्यंत अभिमानी था। मूर्ख चाटुकारों की झूठी प्रशंसा सुनकर उसने अपने आप को साक्षात् भगवान वासुदेव मान लिया। उसने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य चिह्नों की नकल करनी आरंभ कर दी — वह पीताम्बर धारण करता, नकली शंख-चक्र-गदा-पद्म लिए फिरता, वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न बनवाता और स्वयं को 'परमेश्वर वासुदेव' घोषित करता। उसका अहंकार इतना बढ़ गया कि वह अपने को ही सच्चा भगवान समझने लगा।

अपने इसी अभिमान में पौंड्रक ने भगवान श्रीकृष्ण के पास एक दूत भेजा। दूत ने भरी सभा में यह मूर्खतापूर्ण संदेश सुनाया कि "मैं ही एकमात्र सच्चा वासुदेव हूँ; तुम अपने नकली नाम, चिह्न और शस्त्र त्याग दो और मेरी शरण में आ जाओ, तभी तुम्हारी रक्षा हो सकेगी।" इस अहंकारपूर्ण संदेश को सुनकर द्वारका की सभा में सब हँस पड़े। भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए दूत को उत्तर दिया कि वे स्वयं आकर अपने शस्त्र उसे 'लौटा' देंगे।

भगवान अपनी सेना लेकर काशी की ओर चल पड़े, जहाँ पौंड्रक अपने मित्र काशिराज के साथ था। पौंड्रक भी अपनी विशाल सेना और नकली दिव्य साज-सज्जा के साथ भगवान का सामना करने आया। जब पौंड्रक अपने कृत्रिम शंख-चक्रादि लिए सामने आया, तो उसका वह ढोंग भगवान के वास्तविक दिव्य तेज के सम्मुख अत्यंत हास्यास्पद प्रतीत हुआ।

घोर युद्ध आरंभ हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने वास्तविक सुदर्शन चक्र से पौंड्रक के नकली अस्त्रों और सेना को नष्ट कर दिया, और अंत में उसी सुदर्शन चक्र से अभिमानी पौंड्रक का अंत किया। उसका मित्र काशिराज भी उसके साथ आया था; उसका भी अभिमान चूर हुआ। इस प्रकार भगवान ने ढोंग और अहंकार का अंत कर धर्म की रक्षा की।

एक रोचक भाव यह भी है कि पौंड्रक इतने दिनों तक भगवान का रूप-चिंतन करता रहा — यद्यपि द्वेष और अभिमान से — कि उसका मन निरंतर भगवान के दिव्य रूप में लगा रहा। इसी कारण उसे मृत्यु के समय भगवान के हाथों सद्गति प्राप्त हुई। यह भगवान की अपार करुणा है कि विरोध-भाव से किया गया स्मरण भी अंततः उद्धार का कारण बन गया।

पौंड्रक वासुदेव वध की यह कथा सिखाती है कि दूसरों की महिमा की नकल करके या मिथ्या अभिमान करके कोई महान नहीं बनता। सच्ची महानता आडंबर में नहीं, बल्कि विनम्रता और भक्ति में है। भगवान अहंकार का हरण करते हैं, परन्तु जो किसी भी रूप में उनका स्मरण करता है, उस पर भी अंत में कृपा कर देते हैं। यही उनकी असीम उदारता है।

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