
पारिजात वृक्ष की कथा — सत्यभामा और इंद्र
Parijat Vriksh Ki Katha — Satyabhama Aur Indra
नरकासुर-वध के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा अदिति के दर्शन के लिए स्वर्गलोक गए। वहाँ देवराज इंद्र और उनकी पत्नी शची ने उनका बड़े आदर से स्वागत किया। स्वर्ग में उन्होंने नंदन-वन की शोभा देखी, जहाँ समुद्र-मंथन से निकला हुआ दिव्य पारिजात वृक्ष सुशोभित था। उस वृक्ष के पुष्पों की सुगंध अलौकिक थी और वह अपने पास आने वाले की सभी इच्छाएँ पूर्ण करता था।
सत्यभामा उस दिव्य पारिजात वृक्ष के सौंदर्य और सुगंध पर मुग्ध हो गईं। उनके मन में इच्छा जगी कि यह वृक्ष द्वारका में उनके आँगन में लगे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से यह वृक्ष द्वारका ले चलने की प्रार्थना की। भगवान ने अपनी प्रिया की इच्छा पूर्ण करने का निश्चय किया और पारिजात वृक्ष को उखाड़कर गरुड़ पर रखवा लिया।
जब देवराज इंद्र को यह ज्ञात हुआ, तो उनका अभिमान जाग उठा कि स्वर्ग का वृक्ष पृथ्वी पर कैसे ले जाया जा सकता है। वे अपनी सेना और अस्त्रों के साथ भगवान को रोकने के लिए आ पहुँचे। इंद्र और भगवान श्रीकृष्ण के बीच युद्ध हुआ, किन्तु स्वयं सर्वेश्वर के सम्मुख इंद्र का बल कहाँ टिकता। इंद्र पराजित हुए और उन्हें अपने अभिमान का बोध हुआ।
पराजय के पश्चात् इंद्र को लज्जा और पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने भगवान से क्षमा माँगी और स्वयं ही अनुरोध किया कि वे पारिजात वृक्ष द्वारका ले जाएँ। भगवान ने मुस्कुराते हुए इंद्र का मान रखा। यह लीला दिखाती है कि जब भक्त की कोई इच्छा हो, तो भगवान उसे पूर्ण करने के लिए देवताओं से भी विवाद कर लेते हैं, परन्तु किसी का अपमान अंततः शेष नहीं रहने देते।
भगवान पारिजात वृक्ष को द्वारका ले आए और उसे सत्यभामा के आँगन में स्थापित कर दिया। किन्तु उनकी लीला ऐसी थी कि यद्यपि वृक्ष सत्यभामा के आँगन में था, उसके पुष्प रुक्मिणी के आँगन में भी झरते थे। इस प्रकार भगवान ने प्रेम में भी अपनी समता बनाए रखी और किसी रानी को दुःख नहीं होने दिया।
पारिजात वृक्ष की यह कथा सिखाती है कि भगवान अपने भक्तों के प्रेम और इच्छाओं का पूर्ण आदर करते हैं, चाहे उसके लिए स्वर्ग से टकराना ही क्यों न पड़े। साथ ही यह भाव भी मिलता है कि अभिमान चाहे इंद्र का ही क्यों न हो, प्रभु के सम्मुख टिक नहीं पाता। भक्ति में जब समर्पण हो, तो प्रभु स्वयं भक्त की छोटी-सी इच्छा को भी बड़े प्रेम से पूर्ण करते हैं।