
मूषक वाहन की कथा — गजमुखासुर का मूषक बनना
Mushak Vahan Ki Katha - Gajmukhasur Ka Mushak Banna
भगवान गणेश का वाहन मूषक (चूहा) है, जो देखने में तो अत्यंत छोटा प्रतीत होता है, किंतु इसके पीछे एक गूढ़ और रोचक कथा छिपी है। पुराणों में इस विषय पर एक प्रचलित कथा गजमुखासुर नामक एक बलशाली असुर की है, और एक अन्य परंपरा क्रौंच नामक गंधर्व की है। दोनों ही कथाएँ यह दर्शाती हैं कि गणपति के चरणों में आकर बड़े से बड़ा अहंकार और उपद्रवी शक्ति भी विनम्र सेवक बन जाती है।
एक कथा के अनुसार गजमुखासुर नामक असुर ने कठोर तप कर वरदान प्राप्त कर लिया कि वह किसी शस्त्र से न मारा जा सके। इस वरदान के अहंकार में वह देवताओं और ऋषि-मुनियों को अत्यधिक कष्ट देने लगा। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। जब उसका अत्याचार असह्य हो उठा, तो समस्त देवता और ऋषि भगवान गणेश की शरण में पहुँचे और उन्हें इस असुर के संहार की प्रार्थना की।
भगवान गणेश ने भक्तों की रक्षा हेतु गजमुखासुर से युद्ध किया। असुर ने अनेक रूप बदले और गणपति को छलने का प्रयत्न किया, किंतु गणेश जी के तेज और बल के आगे उसका कोई उपाय न चला। अंततः जब असुर पराजित होने लगा, तो उसने बचने के लिए एक विशाल मूषक (चूहे) का रूप धारण कर लिया, यह सोचकर कि वह भाग निकलेगा। किंतु भगवान गणेश ने तत्क्षण उस मूषक-रूपी असुर को वश में कर लिया और उसके ऊपर विराजमान हो गए।
अपने अहंकार का दंड पाकर और गणपति के चरणों का स्पर्श पाकर असुर का समस्त अभिमान चूर हो गया। उसने गणेश जी से क्षमा माँगी और उनकी शरण स्वीकार कर ली। तब गणेश जी ने करुणा करके उसे अपना स्थायी वाहन बना लिया। इस प्रकार जो असुर कभी तीनों लोकों के लिए भय का कारण था, वही अब गणपति का विनम्र मूषक-वाहन बनकर सदा उनके चरणों में रहने लगा। एक अन्य परंपरा में यही कथा क्रौंच नामक गंधर्व की है, जो एक ऋषि के शाप से मूषक बना और अंततः गणेश जी का वाहन बना।
मूषक वाहन का गहरा आध्यात्मिक अर्थ यह है कि चूहा मन की चंचलता, तृष्णा और अहंकार का प्रतीक है, जो सब कुछ कुतर-कुतर कर नष्ट कर देता है। गणपति का उस मूषक पर विराजमान होना यह दर्शाता है कि बुद्धि और विवेक (गणेश) मन की चंचलता और अहंकार को वश में कर लेते हैं। जो अपने मन और अहंकार को गणपति के चरणों में समर्पित कर देता है, वही सच्ची शांति पाता है।
इस कथा का भाव यही है कि अहंकार चाहे कितना भी बलशाली क्यों न हो, ईश्वर के चरणों में आकर वह विनम्र सेवक बन जाता है; गणपति का मूषक-वाहन मन और अहंकार पर विवेक की विजय का पावन प्रतीक है।