Meghnad Ka Brahmastra Aur Bandi Banna

मेघनाद का ब्रह्मास्त्र और बंदी बनना

Meghnad Ka Brahmastra Aur Bandi Banna

अपने पुत्र अक्षय कुमार के वध से व्याकुल रावण ने अब अपने सबसे पराक्रमी और विजयी पुत्र मेघनाद (इन्द्रजित) को उस वानर से युद्ध करने के लिए भेजा। मेघनाद वही वीर था जिसने देवराज इन्द्र तक को परास्त किया था और जिसे अनेक दिव्य अस्त्रों का ज्ञान था। रावण ने उसे आदेश दिया कि इस वानर को किसी भी प्रकार बंदी बनाकर उसके समक्ष प्रस्तुत करे।

मेघनाद अपने विशाल रथ और चुनी हुई सेना के साथ अत्यन्त गर्जना करता हुआ युद्धभूमि में उतरा। हनुमान जी और मेघनाद के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया। मेघनाद ने अपने अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, परंतु हनुमान जी ने बड़ी सहजता से उन सबको व्यर्थ कर दिया। दोनों के इस भयंकर युद्ध को देखकर आकाश में देवता भी विस्मित रह गए।

जब मेघनाद के सारे अस्त्र-शस्त्र निष्फल हो गए और वह हनुमान जी को किसी भी प्रकार परास्त न कर सका, तब उसने अंततः ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। ब्रह्मास्त्र सृष्टि का सबसे अमोघ और अनुल्लंघनीय अस्त्र था, जिसका सम्मान करना ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार आवश्यक था। मेघनाद ने वह दिव्य अस्त्र हनुमान जी पर छोड़ दिया।

हनुमान जी को अपने बल पर पूर्ण विश्वास था और वे ब्रह्मास्त्र को भी सहज ही निष्फल कर सकते थे। परंतु उन्होंने विचार किया कि ब्रह्मास्त्र ब्रह्मा जी के वरदान से युक्त है और उसका सम्मान करना ही उचित है। साथ ही, उनके मन में एक और युक्ति भी थी — यदि वे बंदी बनकर रावण की सभा में जाएँगे, तो उन्हें रावण से भेंट करने और सीता माता के विषय में उसे चेतावनी देने का अवसर मिलेगा।

इसी विवेक से हनुमान जी ने ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए स्वयं को बँध जाने दिया। ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से वे शांत होकर पृथ्वी पर आ गिरे। यह देखकर मेघनाद और राक्षस सैनिक प्रसन्न हुए और उन्होंने हनुमान जी को नागपाश तथा अन्य रस्सियों से बाँध लिया। परंतु ब्रह्मास्त्र का प्रभाव तो बंधन के तुरंत बाद ही समाप्त हो चुका था; हनुमान जी तो केवल अपनी इच्छा से बँधे हुए थे।

इस प्रकार जो हनुमान जी किसी भी बंधन से मुक्त थे, वे केवल एक बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वयं बंदी बने। यह उनकी दूरदर्शिता और प्रभु के कार्य के प्रति समर्पण का अद्भुत उदाहरण था। वे रावण के दरबार तक पहुँचने का यह अवसर हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे।

भाव — सच्चे सेवक के लिए बंधन भी अवसर बन जाता है; विवेकपूर्ण त्याग ही बड़े कार्य की सिद्धि का मार्ग है।

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