
माता-पिता को कारागार से मुक्त करना
Mata-Pita Ko Karagar Se Mukt Karna
कंस का वध कर, अधर्म के अंधकार को मिटाकर श्रीकृष्ण और बलराम का हृदय अब उन प्रियजनों की ओर दौड़ा जो वर्षों से बंधन और वियोग की पीड़ा सह रहे थे। सबसे पहले दोनों भाई सीधे उस कारागार की ओर गए, जहाँ उनके जन्मदाता माता-पिता देवकी और वसुदेव कंस के अत्याचारों को सहते हुए बंदी बनाए गए थे। वही कारागार, जहाँ श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ था और जहाँ से नन्हे कान्हा को गोकुल भेजा गया था।
देवकी और वसुदेव ने वर्षों तक अपने पुत्रों को दूर से ही पलते हुए सुना था, किंतु कभी उन्हें छाती से लगाने का सुख नहीं पा सके थे। अब जब श्रीकृष्ण और बलराम बंधन तोड़कर, कंस का नाश कर उनके सम्मुख आए, तो माता-पिता का हृदय आनंद और स्नेह से भर उठा, किंतु साथ ही एक संकोच भी आ गया। वे भगवान के दिव्य पराक्रम और महिमा को जान चुके थे, इसलिए उन्हें पुत्र-भाव से गले लगाने में हिचकिचाने लगे।
अंतर्यामी श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता के मन के भाव को तुरंत समझ लिया। उन्होंने अपनी योगमाया का विस्तार किया, जिससे देवकी और वसुदेव के मन से "ये साक्षात् परमेश्वर हैं" वाला भाव कुछ मंद हो गया और उनके स्थान पर स्वाभाविक वात्सल्य जाग उठा। तब दोनों भाइयों ने अत्यंत विनम्रता से आगे बढ़कर अपने माता-पिता के चरणों में प्रणाम किया और उन्हें कारागार के बंधनों से मुक्त किया।
श्रीकृष्ण ने हाथ जोड़कर मधुर वाणी में कहा कि हे पिताजी, हे माताजी, कंस के भय के कारण हम इतने वर्षों तक आपकी सेवा नहीं कर सके और आपके वात्सल्य से वंचित रहे। माता-पिता की सेवा, उनकी चरण-रज और स्नेह से बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं है, फिर भी दुर्भाग्यवश हम वह सुख न पा सके — इसके लिए हमें क्षमा करें। भगवान के इन विनम्र वचनों को सुनकर देवकी-वसुदेव के नेत्रों से हर्ष के अश्रु बहने लगे।
तत्पश्चात दोनों भाइयों ने अपने माता-पिता को अपनी गोद में, अपनी छाती से लगाया। वर्षों का वियोग, वर्षों की पीड़ा उस एक आलिंगन में विलीन हो गई। देवकी और वसुदेव अपने पुत्रों को हृदय से लगाकर धन्य हो गए, और उनके नेत्रों से प्रेम की अविरल धारा बहती रही। कारागार, जो कभी दुःख और आँसुओं का स्थान था, अब आनंद और मिलन के मंगल-गान से गूँज उठा।
इस लीला की महिमा यह है कि स्वयं परमेश्वर होते हुए भी श्रीकृष्ण ने पुत्र-धर्म का, विनम्रता का और माता-पिता के प्रति आदर का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया। भगवान अपने भक्तों के प्रेम-बंधन में स्वयं बँध जाते हैं। जो प्रभु समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं, वे भी माता-पिता के चरणों में सिर झुकाते हैं — यही इस कथा का हृदयस्पर्शी संदेश है।