
महागणपति, रांजणगाँव — त्रिपुरासुर वध से पहले शिव की गणेश-पूजा
Mahaganpati, Ranjangaon — Tripurasur Vadh Se Pehle Shiv Ki Ganesh-Puja
पुणे जनपद के पुणे-अहमदनगर मार्ग पर स्थित रांजणगाँव अष्टविनायक तीर्थयात्रा का आठवाँ और अंतिम पड़ाव है। यहाँ श्रीगणेश "महागणपति" के परम तेजस्वी और शक्तिशाली रूप में विराजते हैं। "महागणपति" अर्थात गणों के महानतम स्वामी — यह रूप गणेश के अत्यंत प्रबल और ऐश्वर्यशाली स्वरूप को दर्शाता है, और इसे अष्टविनायक में सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है।
इस स्थल की कथा साक्षात भगवान शिव और त्रिपुरासुर के महायुद्ध से जुड़ी है। प्राचीन काल में त्रिपुरासुर नामक एक महाबलशाली दैत्य हुआ, जिसने कठोर तपस्या करके तीन अभेद्य नगर — सोने, चाँदी और लोहे के — वरदान में प्राप्त किए। ये तीनों नगर आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी पर घूमते रहते थे और एक विशेष क्षण में एक सीध में आने पर ही इन्हें नष्ट किया जा सकता था। इस वरदान के बल पर त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में अत्याचार का तांडव मचा दिया।
देवगण और ऋषि त्रस्त होकर भगवान शिव की शरण में पहुँचे और त्रिपुरासुर के संहार की प्रार्थना की। शिव ने उस असुर से युद्ध आरंभ किया, किंतु आश्चर्य की बात यह हुई कि इतने महान देवाधिदेव भी उस दैत्य को परास्त नहीं कर पा रहे थे। युद्ध लंबा खिंचता गया और शिव को सफलता नहीं मिली। तब उन्हें यह अनुभव हुआ कि उन्होंने युद्ध के आरंभ में विघ्नहर्ता गणेश की पूजा नहीं की, जिसके बिना कोई भी महान कार्य सिद्ध नहीं होता।
तब स्वयं भगवान शिव ने इसी रांजणगाँव के क्षेत्र में रुककर श्रीगणेश की आराधना की। उन्होंने पूर्ण श्रद्धा से "महागणपति" का आवाहन किया और उनसे विजय का आशीर्वाद माँगा। गणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने शिव को त्रिपुरासुर पर विजय का वरदान प्रदान किया। गणेश-कृपा से शिव के भीतर अपार शक्ति का संचार हुआ और उन्हें युद्ध का सही मार्ग सूझ गया।
गणेश की आराधना के पश्चात भगवान शिव ने अपना दिव्य धनुष उठाया और सही क्षण की प्रतीक्षा की, जब तीनों उड़ते नगर एक सीध में आ गए। ठीक उसी क्षण उन्होंने एक ही बाण से तीनों त्रिपुरों को भस्म कर दिया और त्रिपुरासुर का वध कर दिया। इस महान विजय के बाद तीनों लोकों में आनंद व्याप्त हो गया और देवताओं ने गणेश तथा शिव की जय-जयकार की।
चूँकि शिव ने यहीं गणेश की आराधना कर महान विजय प्राप्त की, इसलिए यहाँ के गणेश "महागणपति" के नाम से विख्यात हुए और यह क्षेत्र अत्यंत जाग्रत तीर्थ बन गया। महागणपति की मूर्ति पूर्वाभिमुख है और अत्यंत भव्य है। कहा जाता है कि इनका मूल तेजस्वी स्वरूप दस सूँडों और बीस भुजाओं वाला है, जो असीम शक्ति का प्रतीक है, यद्यपि सामान्य दर्शन में भक्त उनके सौम्य रूप के ही दर्शन करते हैं।
महागणपति की महिमा अपार है। यह कथा हमें यह पावन शिक्षा देती है कि जब स्वयं देवाधिदेव महादेव को भी विजय के लिए गणेश-पूजन करना पड़ा, तो मनुष्य को अपने प्रत्येक कार्य के आरंभ में विघ्नहर्ता का स्मरण अवश्य करना चाहिए। रांजणगाँव का यह धाम अष्टविनायक यात्रा को पूर्णता प्रदान करता है और भक्तों को शक्ति, विजय तथा निर्विघ्न जीवन का आशीर्वाद देता है। जय महागणपति, गणपति बाप्पा मोरया।