Madhuvan Vidhwans

मधुवन विध्वंस

Madhuvan Vidhwans

समुद्र पार कर, माता सीता के दर्शन का शुभ समाचार लेकर लौटे हनुमान जी और अन्य वानर जब किष्किन्धा की ओर बढ़ रहे थे, तब उनके हृदय हर्ष और उत्साह से भरे हुए थे। कार्य की सफलता का आनन्द उनके रोम-रोम में समा गया था। इसी उल्लास में जब वे सुग्रीव के प्रिय और सुरक्षित उपवन मधुवन के पास पहुँचे, तो उनका मन उसके मधुर फलों और मधु को चखने के लिए ललचा उठा।

मधुवन सुग्रीव का अत्यन्त प्रिय और संरक्षित उद्यान था, जहाँ प्रवेश की आज्ञा सामान्यतः किसी को नहीं थी और उसकी रक्षा के लिए विशेष रक्षक नियुक्त थे। परंतु हनुमान जी की सफलता से उत्साहित वानरों ने अंगद और हनुमान जी से अनुमति लेकर उस मधुवन में प्रवेश किया और मीठे फल तथा मधु का जी भरकर आनन्द लेने लगे। सफलता की प्रसन्नता में वे सब मस्त हो उठे।

मधुवन के रक्षक दधिमुख ने जब वानरों को उपवन उजाड़ते और मधु का सेवन करते देखा, तो उसने उन्हें रोकना चाहा। परंतु उल्लास में डूबे वानर कहाँ रुकने वाले थे। जब दधिमुख ने बलपूर्वक रोकने का प्रयास किया, तो वानरों ने भी उसका प्रतिकार किया और मधुवन में खूब उछल-कूद मचाकर उसे तहस-नहस कर दिया। रक्षक बेचारे विवश होकर पीछे हट गए।

दधिमुख इस स्थिति से घबराकर तुरंत सुग्रीव के पास पहुँचा और उन्हें शिकायत की कि वानर मधुवन को उजाड़ रहे हैं और रोकने पर वे उलटा उपद्रव कर रहे हैं। परंतु राजा सुग्रीव, जो नीति और संकेतों को समझते थे, इस समाचार से क्रोधित होने के बजाय अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। उन्होंने तुरंत समझ लिया कि इसका गूढ़ अर्थ क्या है।

सुग्रीव ने दधिमुख से कहा कि तुम चिंता मत करो, यह तो अत्यन्त शुभ संकेत है। जो वानर कार्य में असफल होते, वे इस प्रकार निर्भय होकर मधुवन में उपद्रव करने का साहस कभी न करते। उनका यह उल्लास इसी बात का प्रमाण है कि उन्हें अवश्य ही सीता माता का पता चल गया है और वे अपना कार्य सिद्ध करके लौटे हैं। यह सुनकर प्रभु श्रीराम का हृदय भी आशा से भर उठा।

इस प्रकार मधुवन का विध्वंस केवल एक उपवन का उजड़ना नहीं, बल्कि वानरों की सफलता और आनन्द का प्रतीक बन गया। थोड़ी ही देर में हनुमान जी और सारे वानर सुग्रीव तथा प्रभु श्रीराम के समक्ष पहुँचे और सीता माता के दर्शन का शुभ समाचार सुनाया, जिससे सबके मुख प्रसन्नता से खिल उठे और आगे के महान कार्य — सीता माता के उद्धार — का मार्ग प्रशस्त हो गया।

भाव — सच्ची सफलता का उल्लास स्वयं ही शुभ समाचार बन जाता है; प्रभु का कार्य सिद्ध होने पर चारों ओर आनन्द ही आनन्द छा जाता है।

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