
जरासंध वध — भीम द्वारा, कृष्ण की नीति
Jarasandh Vadh — Bheem Dwara, Krishna Ki Neeti
मगधराज जरासंध अत्यंत बलशाली और अभिमानी सम्राट था। उसने अनेक राजाओं को युद्ध में परास्त कर बंदी बना रखा था और उन्हें अपने अधीन एक पर्वत-गुफा में कैद कर रखा था। उसकी योजना थी कि जब बंदी राजाओं की संख्या सौ पूरी हो जाएगी, तब वह उन सबकी बलि देकर भगवान शिव को प्रसन्न करेगा। इस अधर्मपूर्ण योजना से पीड़ित राजा भगवान श्रीकृष्ण से गुप्त रूप से रक्षा की प्रार्थना कर रहे थे।
जब धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का संकल्प किया, तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जब तक जरासंध जीवित है, यह यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता, क्योंकि वह समस्त राजाओं पर आधिपत्य जमाए बैठा है। भगवान जानते थे कि जरासंध की मृत्यु शस्त्रों से नहीं, बल्कि द्वंद्व-युद्ध में होनी है, और उसके लिए भीमसेन ही उपयुक्त हैं। इसी नीति के अनुसार उन्होंने एक विशेष उपाय रचा।
भगवान श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन — तीनों ब्राह्मण के वेश में मगध पहुँचे। जरासंध अतिथि-सत्कार और दान के लिए प्रसिद्ध था। भगवान ने उससे द्वंद्व-युद्ध की भिक्षा माँगी। जरासंध ने उनके तेज को देखकर पहचान लिया कि ये साधारण ब्राह्मण नहीं हैं। उसने वीरोचित भाव से भीमसेन के साथ मल्ल-युद्ध स्वीकार कर लिया, क्योंकि वह अपने समान बलशाली को ही योग्य प्रतिद्वंद्वी मानता था।
भीम और जरासंध के बीच अत्यंत भयंकर मल्ल-युद्ध आरंभ हुआ, जो कई दिनों तक चलता रहा। दोनों समान बल के थे, अतः किसी की हार-जीत नहीं हो पा रही थी। जरासंध थकता तो अवश्य, परन्तु उसका शरीर पुनः जुड़ जाता और वह फिर से बलवान हो उठता। भीम इस रहस्य को समझ नहीं पा रहे थे कि जरासंध बार-बार पुनर्जीवित-सा कैसे हो जाता है।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने भीम को एक संकेत दिया। उन्होंने एक तिनके को बीच से चीरकर उसके दोनों टुकड़े विपरीत दिशाओं में फेंक दिए। भीम ने इस संकेत का अर्थ समझ लिया — जरासंध का जन्म दो अलग-अलग भागों से हुआ था, जिन्हें जरा नामक राक्षसी ने जोड़ा था, इसीलिए वह चीरने पर पुनः जुड़ जाता था। भीम ने जरासंध को पछाड़कर उसके शरीर के दो भाग कर दिए और उन्हें विपरीत दिशाओं में फेंक दिया, जिससे वे पुनः न जुड़ सकें। इस प्रकार जरासंध का अंत हुआ।
जरासंध के वध के पश्चात् भगवान ने उसके कारागार में बंदी समस्त राजाओं को मुक्त कराया और उन्हें सम्मान दिया। मुक्त राजाओं ने भगवान की स्तुति की और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की। इसके पश्चात् ही राजसूय यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हो सका। जरासंध वध की यह कथा सिखाती है कि भगवान स्वयं शस्त्र न उठाकर भी अपनी नीति और मार्गदर्शन से अधर्म का अंत करा देते हैं। जहाँ भगवान की बुद्धि और भक्त का बल एक साथ हों, वहाँ अधर्म कभी टिक नहीं सकता।