
गुरुदक्षिणा — गुरुपुत्र को यमलोक से वापस लाना
Gurudakshina — Guruputra Ko Yamlok Se Wapas Lana
संदीपनी आश्रम में समस्त विद्याओं और चौंसठ कलाओं में पूर्ण प्रवीणता प्राप्त करने के पश्चात, श्रीकृष्ण और बलराम ने अपने पूज्य गुरु संदीपनी के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि हे गुरुदेव, अब आप हमें गुरुदक्षिणा के रूप में जो भी अभीष्ट हो, आज्ञा दें। शिष्य का धर्म है कि वह विद्या-प्राप्ति के पश्चात गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा अर्पित करे — और श्रीकृष्ण इस आदर्श को संसार के समक्ष प्रकट करना चाहते थे।
गुरु संदीपनी और उनकी पत्नी ने आपस में विचार किया। वे अपने उन दोनों दिव्य शिष्यों के अलौकिक सामर्थ्य को जान चुके थे। उनके मन में एक ही गहरी पीड़ा थी — उनका पुत्र प्रभास क्षेत्र में समुद्र-स्नान करते समय समुद्र में डूबकर काल के गाल में समा गया था, और उसका शव भी नहीं मिला था। पुत्र-वियोग का वह असह्य दुःख उनके हृदय में सदा टीस बनकर रहता था। अतः उन्होंने दक्षिणा-स्वरूप अपने उसी मृत पुत्र को वापस लाने की प्रार्थना की।
गुरु की यह इच्छा सुनकर श्रीकृष्ण और बलराम तुरंत रथ पर सवार होकर प्रभास क्षेत्र के उस समुद्र-तट पर पहुँचे, जहाँ गुरुपुत्र डूबा था। श्रीकृष्ण ने समुद्र को आदेश दिया कि वह गुरुपुत्र को लौटा दे। भगवान का तेज और आज्ञा पाकर समुद्र स्वयं मूर्तिमान होकर प्रकट हुआ और हाथ जोड़कर बोला कि हे प्रभु, वह बालक मेरे जल में तो नहीं है; उसे तो शंखासुर नामक एक दैत्य ने हर लिया है, जो शंख के भीतर रहता है और मेरे भीतर निवास करता है।
यह सुनकर श्रीकृष्ण ने समुद्र में प्रवेश कर शंखासुर नामक उस दैत्य को खोज निकाला और उसका अंत कर दिया। किंतु उसके शरीर में उन्हें गुरुपुत्र नहीं मिला, केवल एक दिव्य शंख प्राप्त हुआ, जिसे भगवान ने ग्रहण किया — यही आगे चलकर उनका प्रसिद्ध पांचजन्य शंख बना। तब श्रीकृष्ण और बलराम गुरुपुत्र को ढूँढते हुए स्वयं यमराज की नगरी संयमनी पुरी पहुँचे।
श्रीकृष्ण ने वहाँ अपने पांचजन्य शंख को बजाया। उस दिव्य ध्वनि को सुनकर यमराज ने भगवान का यथोचित पूजन-सत्कार किया और विनम्रता से उनकी आज्ञा माँगी। श्रीकृष्ण ने कहा कि हमारे गुरु का जो पुत्र यहाँ अपने कर्मानुसार लाया गया है, उसे हमें सौंप दें, क्योंकि हम गुरुदक्षिणा-हेतु उसे वापस ले जाना चाहते हैं। यमराज ने सादर उस बालक को भगवान को समर्पित कर दिया।
गुरुपुत्र को जीवित और सकुशल लेकर श्रीकृष्ण और बलराम गुरु संदीपनी के पास लौट आए और उसे उनके चरणों में समर्पित कर दिया। अपने खोए हुए पुत्र को यमलोक से वापस पाकर गुरु और गुरुपत्नी का हृदय आश्चर्य, आनंद और कृतज्ञता से भर गया। उन्होंने भाव-विभोर होकर दोनों भाइयों को हृदय से लगाया और अनेक आशीर्वाद दिए।
इस लीला की महिमा यह है कि गुरु के प्रति कृतज्ञता और उनकी इच्छा-पूर्ति ही सच्ची गुरुदक्षिणा है। जो भगवान जन्म-मृत्यु और काल के भी स्वामी हैं, उन्होंने गुरु के प्रति अपने ऋण को चुकाने के लिए यमलोक तक जाकर मृत बालक को लौटा दिया। यह कथा हमें सिखाती है कि गुरु-भक्ति के समक्ष असंभव भी संभव हो जाता है, और भगवान अपने भक्तों की सेवा में सदा तत्पर रहते हैं।