
अशोक वाटिका उजाड़ना
Ashok Vatika Ujaadna
सीता माता को प्रभु का संदेश देकर और उनका विश्वास जीतकर हनुमान जी ने विचार किया कि अब उन्हें रावण की शक्ति का सामना करना चाहिए और उसे यह अनुभव कराना चाहिए कि श्रीराम का दूत कोई साधारण वानर नहीं है। इससे रावण के मन में भय उत्पन्न होगा और उसे अपने अधर्म का परिणाम समझ में आने लगेगा। इसके लिए उन्होंने रावण की प्रिय अशोक वाटिका को ही उजाड़ने का निश्चय किया।
जाने से पहले हनुमान जी ने माता सीता से आज्ञा माँगी कि वे भूख से व्याकुल हैं, अतः वाटिका के मधुर फल खाने की अनुमति दें। सीता जी ने स्नेहपूर्वक आशीर्वाद देते हुए उन्हें फल खाने की अनुमति दे दी, यह विश्वास करते हुए कि प्रभु के इस दूत का बल इन राक्षसों से कहीं अधिक है। माता का आशीर्वाद पाकर हनुमान जी और भी उत्साहित हो उठे।
फिर हनुमान जी ने अपना विशाल रूप धारण किया और वाटिका के वृक्षों पर चढ़कर मधुर फल खाने लगे। भूख शान्त कर उन्होंने वृक्षों को उखाड़ना, शाखाओं को तोड़ना और सुन्दर उपवन को उजाड़ना आरम्भ कर दिया। थोड़ी ही देर में वह सुसज्जित वाटिका छिन्न-भिन्न हो गई, केवल वही अशोक वृक्ष उन्होंने छोड़ा जिसके नीचे माता सीता विराजमान थीं।
वाटिका उजड़ने का शोर सुनकर वहाँ की पहरेदार राक्षसियाँ घबरा गईं और उन्होंने दौड़कर रावण को समाचार दिया कि एक विशाल वानर ने अशोक वाटिका को नष्ट कर दिया है और वह अद्भुत बलशाली प्रतीत होता है। यह सुनकर रावण क्रोध से भर उठा और उसने वानर को पकड़ने अथवा मारने के लिए अपने योद्धाओं को तत्काल भेजा।
हनुमान जी ने भी युद्ध के लिए स्वयं को तैयार कर लिया। उन्होंने वाटिका के एक ऊँचे तोरणद्वार पर चढ़कर "जय श्रीराम" की गर्जना की, जिससे सारी लंका काँप उठी। उनका उद्देश्य केवल विध्वंस नहीं था, बल्कि रावण को यह चेतावनी देना था कि जिसका दूत इतना बलशाली है, उसका स्वामी कितना प्रतापी होगा और उससे बैर लेने का परिणाम कितना भयंकर होगा।
इस प्रकार हनुमान जी ने बुद्धिपूर्वक अपने कार्य को आगे बढ़ाया। अशोक वाटिका का उजड़ना केवल एक उपवन का नाश नहीं था, बल्कि रावण के अहंकार पर पहला प्रहार और उसके विनाश की भूमिका थी। हनुमान जी का यह पराक्रम प्रभु के प्रति उनकी अटूट भक्ति और साहस का प्रतीक बन गया।
भाव — प्रभु के भक्त का बल अधर्मी के अहंकार को चूर करने के लिए ही प्रकट होता है; निर्भयता भक्ति का सहज गुण है।