Ashok Vatika Mein Sita Darshan

अशोक वाटिका में सीता दर्शन

Ashok Vatika Mein Sita Darshan

विभीषण से मार्गदर्शन पाकर हनुमान जी अशोक वाटिका की ओर चल पड़े। वह वाटिका नाना प्रकार के वृक्षों, पुष्पों और सरोवरों से सुसज्जित थी, परंतु उसकी शोभा में कहीं भी प्रसन्नता न थी। हनुमान जी ने एक ऊँचे वृक्ष की घनी शाखाओं में छिपकर चारों ओर दृष्टि दौड़ाई, इस आशा से कि कहीं माता सीता के दर्शन हो जाएँ।

खोजते-खोजते उनकी दृष्टि एक शिंशपा (अशोक) वृक्ष के नीचे बैठी हुई एक तेजस्विनी देवी पर पड़ी। वे मलिन वस्त्रों में थीं, शरीर दुर्बल और कान्तिहीन-सा हो गया था, केश बिखरे हुए थे और नेत्रों से निरन्तर अश्रु बह रहे थे। फिर भी उनके मुख पर एक अलौकिक तेज और पातिव्रत्य की दिव्य आभा थी। उनके चारों ओर विकराल राक्षसियाँ पहरा दे रही थीं।

हनुमान जी ने तुरंत पहचान लिया कि ये अवश्य ही माता सीता हैं। वे प्रभु श्रीराम के वियोग में तपस्विनी के समान बैठी थीं, न भोजन करती थीं, न आभूषण धारण करती थीं। उनकी दृष्टि सदा उत्तर दिशा की ओर लगी रहती, मानो वे प्रभु के आने की प्रतीक्षा कर रही हों। यह करुण दृश्य देखकर हनुमान जी का हृदय द्रवित हो उठा और उनकी आँखें भर आईं।

तभी वहाँ रावण अपनी रानियों के साथ आया और उसने अनेक प्रलोभन तथा भय दिखाकर सीता जी को अपनी ओर करना चाहा। परंतु सीता जी ने एक तिनके को अपने और रावण के बीच रखकर, दृढ़ता से उसे धिक्कारा और कहा कि श्रीराम के अतिरिक्त उनके मन में किसी का स्थान नहीं। रावण ने क्रोध में उन्हें भयभीत करने का प्रयास किया, पर सीता जी अडिग रहीं।

रावण के जाने के बाद त्रिजटा नामक एक धर्मात्मा राक्षसी ने अपना स्वप्न सुनाकर अन्य राक्षसियों को समझाया कि श्रीराम की विजय और रावण का विनाश निश्चित है, अतः सीता जी को कष्ट न दें। इस पर भी सीता जी की व्याकुलता कम न हुई और वे प्रभु-वियोग में इतनी दुःखी हुईं कि अपने प्राण त्यागने तक का विचार करने लगीं।

वृक्ष पर छिपे हनुमान जी यह सब देख-सुन रहे थे। उन्होंने अनुभव किया कि माता का धैर्य टूट रहा है और यही उपयुक्त समय है कि उन्हें प्रभु के आगमन का विश्वास दिलाकर सांत्वना दी जाए। उन्होंने मन में श्रीराम का स्मरण किया और सोचा कि किस प्रकार वे माता को भयभीत किए बिना अपना संदेश पहुँचाएँ।

भाव — सीता माता का अटल पातिव्रत्य और प्रभु के प्रति प्रेम भक्ति की सर्वोच्च मिसाल है; सच्चा प्रेम विपत्ति में भी डिगता नहीं।

🔗 Open Link / Video →

Related Stories

Sau Yojan Samudra Langhna

सौ योजन समुद्र लाँघना

Sundarkand
Mainak Parvat Ka Aatithya

मैनाक पर्वत का आतिथ्य

Sundarkand
Sursa Ki Pariksha — Sukshma Roop Ki Chaturai

सुरसा की परीक्षा — सूक्ष्म रूप की चतुराई

Sundarkand
Sinhika Vadh — Chhaya Pakadne Wali Rakshasi

सिंहिका वध — छाया पकड़ने वाली राक्षसी

Sundarkand
Lankini Ko Parast Karna

लंकिनी को परास्त करना

Sundarkand
Lanka Mein Pravesh Aur Bhavano Ki Khoj

लंका में प्रवेश और भवनों की खोज

Sundarkand