
अक्षय कुमार वध
Akshay Kumar Vadh
अशोक वाटिका के उजड़ने और वानर के अद्भुत बल का समाचार सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित हुआ। उसने अपने योद्धाओं को उस वानर को पकड़ने अथवा मार डालने के लिए भेजा। परंतु हनुमान जी ने तोरणद्वार पर खड़े होकर, जो भी राक्षस योद्धा उन पर आक्रमण करने आया, उसे अपने अपार बल से परास्त कर दिया। एक-एक कर अनेक वीर राक्षस उनके सामने ढेर हो गए।
जब रावण के भेजे हुए सैनिक और सेनापति एक-एक करके पराजित होने लगे, तब क्रोध और चिंता में डूबे रावण ने अपने पराक्रमी पुत्र अक्षय कुमार को युद्ध के लिए भेजा। अक्षय कुमार यद्यपि आयु में छोटा था, परंतु बल, वीरता और युद्ध-कौशल में अत्यन्त निपुण था। वह अपने रथ पर सवार होकर, धनुष-बाण से सुसज्जित होकर, गर्जना करता हुआ हनुमान जी की ओर बढ़ा।
अक्षय कुमार ने आते ही हनुमान जी पर बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। उसके बाण तीव्र और घातक थे, परंतु हनुमान जी ने बड़ी फुर्ती से उन्हें व्यर्थ कर दिया। दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। अक्षय कुमार का साहस देखकर हनुमान जी ने मन में उसकी वीरता की सराहना की, परंतु वे जानते थे कि यह अधर्म के पक्ष का योद्धा है और इसका दमन आवश्यक है।
हनुमान जी ने पहले तो अक्षय कुमार को अनेक अवसर दिए, परंतु जब उस वीर बालक ने अपने प्रहार और तीव्र कर दिए, तब हनुमान जी ने निश्चय किया कि अब इसे रोकना ही होगा। उन्होंने आकाश में उछलकर, अपने पूरे बल से अक्षय कुमार पर एक भीषण प्रहार किया। उस एक ही प्रहार से अक्षय कुमार का बल क्षीण हो गया और वह वीरगति को प्राप्त हुआ।
अपने प्रिय पुत्र अक्षय कुमार के वध का समाचार सुनकर रावण शोक और क्रोध से तिलमिला उठा। अब उसे पहली बार यह अनुभव हुआ कि यह वानर कोई सामान्य प्राणी नहीं, बल्कि किसी महान शक्ति का दूत है, जिसे परास्त करना सरल नहीं। उसकी चिंता और भी गहरी हो गई कि जब दूत इतना बलशाली है, तो उसका स्वामी कितना प्रबल होगा।
अक्षय कुमार का वध हनुमान जी की अपार शक्ति का प्रमाण था, परंतु उन्होंने इसमें कहीं भी अहंकार नहीं दिखाया। उनके लिए यह प्रभु के कार्य में आने वाली एक बाधा को दूर करना मात्र था। उनका मन तो सदा श्रीराम के चरणों में लगा रहा, और उनका बल केवल धर्म की रक्षा और अधर्म के दमन के लिए ही प्रकट हुआ।
भाव — धर्म के दूत का बल अजेय होता है; प्रभु का भक्त बड़े से बड़े योद्धा को भी सहज ही परास्त कर देता है।