Vari Jaun Re Balihari
वारि जाऊँ रे, बलिहारी
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✍️ रचयिता: दास नारायण
इस भजन के बारे में
यह सुंदर भजन सतगुरु की महिमा और उनके प्रति शिष्य के असीम प्रेम को समर्पित है। इस भजन में भक्त अपने गुरु के आगमन को अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। 'वारि जाऊँ' का अर्थ है कि भक्त अपने गुरु पर अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार है। यहाँ सतगुरु को ईश्वर का साक्षात रूप माना गया है, जिनके दर्शन मात्र से भक्त के मन के सारे विकार, भ्रम और पुराने कर्म धुल जाते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि जब गुरु का आशीर्वाद मिलता है, तो हृदय के द्वार खुल जाते हैं और जीवन में आनंद का संचार होता है।
यह भजन विशेष रूप से गुरु पूर्णिमा, सत्संग के कार्यक्रमों या गुरु के जन्मोत्सव पर गाया जाता है। जब भक्त का मन गुरु की भक्ति में डूब जाता है और वह स्वयं को पूरी तरह समर्पित करना चाहता है, तब इस भजन का गायन बहुत ही भावपूर्ण होता है। इसे गाने से मन में शांति आती है और अहंकार का नाश होता है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि गुरु ही वह प्रकाश हैं जो हमारे जीवन की नैया को भवसागर से पार लगाते हैं। इसे गाते समय भक्त का हृदय कृतज्ञता और प्रेम से भर जाता है।
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