Chetavni Bhajan

Vari Jaun Re Balihari

वारि जाऊँ रे, बलिहारी

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सतगुरु मेरी आत्मा, मैं संतन की देह। रोम रोम में रम रया, ज्यूं बादल में मेह ॥ दोहा वारि जाऊँ रे, बलिहारी जाऊँ रे। म्हारे सतगुरु आँगण आया, मैं वारि जाऊँ रे ॥ टेक ॥ सतगुरु आँगण आया, मैं गंगा गोमती नहाया। म्हारी निर्मल हो गई काया, मैं वारि जाऊँ रे ॥1॥ सतगुरु दर्शण दीना, म्हारा भाग उदय कर दीना। करम भरम सब छीना रे, मैं वारि जाऊँ रे ॥2॥ सखियाँ मिळकर आवो, केसर रा तिलक लगावो। गुरुदेव ने बधावो रे, मैं वारि जाऊँ रे ॥3॥ सतसंग बण गई भारी, थे गावो मंगळाचारी। म्हारे खुली हिरदे री बारी रे, मैं वारि जाऊँ रे ॥4॥ दास नारायण जस गावे, चरणां में शीश झुकावे। म्हारो बेड़ो पार लगावो रे, मैं वारि जाऊँ रे ॥5॥

✍️ रचयिता: दास नारायण

इस भजन के बारे में

यह सुंदर भजन सतगुरु की महिमा और उनके प्रति शिष्य के असीम प्रेम को समर्पित है। इस भजन में भक्त अपने गुरु के आगमन को अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। 'वारि जाऊँ' का अर्थ है कि भक्त अपने गुरु पर अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार है। यहाँ सतगुरु को ईश्वर का साक्षात रूप माना गया है, जिनके दर्शन मात्र से भक्त के मन के सारे विकार, भ्रम और पुराने कर्म धुल जाते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि जब गुरु का आशीर्वाद मिलता है, तो हृदय के द्वार खुल जाते हैं और जीवन में आनंद का संचार होता है।

यह भजन विशेष रूप से गुरु पूर्णिमा, सत्संग के कार्यक्रमों या गुरु के जन्मोत्सव पर गाया जाता है। जब भक्त का मन गुरु की भक्ति में डूब जाता है और वह स्वयं को पूरी तरह समर्पित करना चाहता है, तब इस भजन का गायन बहुत ही भावपूर्ण होता है। इसे गाने से मन में शांति आती है और अहंकार का नाश होता है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि गुरु ही वह प्रकाश हैं जो हमारे जीवन की नैया को भवसागर से पार लगाते हैं। इसे गाते समय भक्त का हृदय कृतज्ञता और प्रेम से भर जाता है।

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