Udho Tum Hau Ati Badbhagi
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी
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इस भजन के बारे में
यह प्रसिद्ध पद महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित 'भ्रमरगीत' का एक अंश है। इसमें गोपियाँ उद्धव जी पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं कि आप बहुत भाग्यशाली हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण के इतने निकट रहकर भी आप उनके प्रेम के बंधन से पूरी तरह मुक्त हैं। गोपियाँ कमल के पत्ते और तेल की मटकी का उदाहरण देकर समझाती हैं कि जैसे पानी में रहकर भी कमल का पत्ता गीला नहीं होता, वैसे ही आप कृष्ण के सानिध्य में रहकर भी उनके प्रेम के रंग में नहीं रंगे।
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण और उनके सखा उद्धव के संवाद पर आधारित है। यहाँ गोपियों का 'विरह' और 'अनन्य प्रेम' झलकता है। वे कहती हैं कि हम तो कृष्ण के प्रेम में गुड़ पर चिपकी चींटियों की तरह पूरी तरह डूब चुकी हैं, जबकि आप निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान में उलझे हैं। भक्त इस भजन को तब गाते हैं जब वे ईश्वर के प्रति अपनी व्याकुलता और अटूट समर्पण को व्यक्त करना चाहते हैं। इसे गाने से मन में प्रभु के प्रति प्रेम और भक्ति का भाव जागृत होता है और भक्त को अपनी भावनाओं को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने की प्रेरणा मिलती है।
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