Mero Man Anat Kahan Sukh Pave
मेरो मन अनत कहां सुख पावै
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इस भजन के बारे में
यह प्रसिद्ध पद भक्त शिरोमणि सूरदास जी द्वारा रचित है। इसमें भक्त का अपने आराध्य श्री कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम और निष्ठा व्यक्त की गई है। सूरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार समुद्र के बीच जहाज पर बैठा पक्षी चारों ओर पानी देखकर अंत में वापस जहाज पर ही लौट आता है, उसी प्रकार मेरा मन भी संसार के अन्य सुखों को छोड़कर अंत में प्रभु के चरणों में ही शांति पाता है। यहाँ भक्त यह स्वीकार करता है कि श्री कृष्ण की भक्ति ही परम सुख का एकमात्र साधन है।
इस भजन में सूरदास जी ने बहुत सुंदर उदाहरण दिए हैं, जैसे प्यासा व्यक्ति गंगा को छोड़कर कुआँ नहीं खोदता और जिसे कमल का रस मिल गया हो, वह कड़वे फल क्यों खाएगा? यह भजन हमें सिखाता है कि जब हमें साक्षात परमेश्वर का सानिध्य प्राप्त है, तो तुच्छ सांसारिक वस्तुओं के पीछे भागना व्यर्थ है। भक्त इस भजन को तब गाते हैं जब वे मन की एकाग्रता और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव महसूस करना चाहते हैं। इसे गाने से मन को असीम शांति मिलती है और हृदय में प्रभु के प्रति प्रेम और कृतज्ञता का भाव जागृत होता है।
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