Hamare Hari Haril Ki Lakri
हमारे हरि हारिल की लकरी
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इस भजन के बारे में
यह पद महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें गोपियाँ उद्धव को अपने अनन्य प्रेम का परिचय देती हैं। गोपियाँ श्री कृष्ण की तुलना 'हारिल' पक्षी की लकड़ी से करती हैं, जो अपने पंजों में लकड़ी को मजबूती से थामे रखता है। जिस प्रकार वह पक्षी उस लकड़ी को कभी नहीं छोड़ता, उसी प्रकार गोपियों ने अपने मन, वचन और कर्म से कृष्ण को हृदय में बसा लिया है। उनके लिए कृष्ण के बिना जीवन की कल्पना करना भी असंभव है।
गोपियाँ कहती हैं कि वे जागते, सोते, दिन और रात केवल कृष्ण का ही नाम जपती रहती हैं। जब उद्धव उन्हें निर्गुण ब्रह्म और योग का संदेश देते हैं, तो उन्हें वह कड़वी ककड़ी के समान अरुचिकर लगता है। वे स्पष्ट कहती हैं कि योग का यह संदेश उन लोगों को जाकर दें जिनका मन चंचल है, क्योंकि उनका मन तो पहले से ही कृष्ण के प्रेम में स्थिर है। यह भजन प्रेम की अटूट निष्ठा और भक्ति की सरलता को दर्शाता है। भक्त इसे तब गाते हैं जब वे ईश्वर के प्रति अपनी पूर्ण समर्पण भावना को व्यक्त करना चाहते हैं। इसे सुनने या गाने से मन की चंचलता दूर होती है और प्रभु के प्रति विश्वास दृढ़ होता है।
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