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Mo Sam Kaun Kutil Khal Kami

मो सम कौन कुटिल खल कामी

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Mo Sam Kaun Kutil Khal Kami
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मो सम कौन कुटिल खल कामी। जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी। भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी। हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी। पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी। सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥

इस भजन के बारे में

यह भजन महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें वे भगवान श्री कृष्ण के समक्ष अपनी दीनता और आत्म-समर्पण प्रकट कर रहे हैं। इस पद में भक्त स्वयं को संसार का सबसे बड़ा पापी और कुटिल मानता है। सूरदास जी कहते हैं कि जिस ईश्वर ने मुझे यह मनुष्य शरीर दिया, मैंने उसे ही भुला दिया और दिन-रात सांसारिक विषयों और मोह-माया में लिप्त रहा। यह भजन हमें अपनी गलतियों का अहसास कराता है और सिखाता है कि अहंकार त्यागकर ही प्रभु की शरण प्राप्त की जा सकती है।

यह भजन मुख्य रूप से श्री कृष्ण की भक्ति और शरणागति का प्रतीक है। भक्त इसे तब गाते हैं जब वे अपने मन में पश्चाताप महसूस करते हैं और प्रभु से क्षमा याचना करना चाहते हैं। इसे गाने का भाव यह है कि चाहे हम कितने भी पतित क्यों न हों, यदि हम सच्चे मन से प्रभु को पुकारें, तो वे हमें अवश्य स्वीकार करते हैं। यह भजन मन की शुद्धि और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास जगाने के लिए विशेष रूप से कीर्तन और सत्संग के समय गाया जाता है।

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