Sun Sun Mhara Manva Veer
सुण सुण म्हारा मनवा वीर
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अजगर करे ना चाकरी, और पंछी करे ना काम ।
दास मलूका कह गए, भाई सबके दाता राम ॥ दोहा
कबीरा सोया क्या करे, उठ भजे भगवान ।
जम जब घर ले जाएंगे, भाई पड़ी रहेगी म्यान ॥ श्लोक
सुण सुण म्हारा मनवा वीर, एड़ी नहीं करणी रे ।
जळ उण्डो रे संसार, दोरो तिरणो रे ।
माया रो मोटो जाळ, गरब नहीं करणो रे ॥ टेक ॥
सुमता कुमता नार दोय पटराणी रे ।
दोनां रो और स्वभाव, संत पिछाणी रे ।
सुण सुण म्हारा मनवा वीर, एड़ी नहीं करणी रे ॥1॥
आ गई रे कुमता नार, कुबदा कर गई रे ।
म्हाने राखियो चौरासी रे माँय, जनम डुबाय गई ।
सुण सुण म्हारा मनवा वीर, एड़ी नहीं करणी रे ॥2॥
आ गई रे सुमता नार, सुध बुध देय गई ।
म्हाने तारियो चौरासी रे माँय, जनम सुधार गई ।
सुण सुण म्हारा मनवा वीर, एड़ी नहीं करणी रे ॥3॥
ओ म्हे तो किण ने सुणाऊँ गुरु ज्ञान, उठ उठ भागे रे ।
ज्यां रा हिरदा बड़ा रे कठोर, रंग नहीं लागे रे ।
सुण सुण म्हारा मनवा वीर, एड़ी नहीं करणी रे ॥4॥
नाभि कमल रे माँय गंगा खळकी रे ।
ए तो अड़ा रे उड़द रे बीच गंगा खळकी रे ।
ए तो केवे संत कबीर भगती करणी रे ।
सुण सुण म्हारा मनवा वीर, एड़ी नहीं करणी रे ॥5॥
✍️ रचयिता: संत कबीर
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