Chetavni Bhajan

Saccha Mitra Poot Sapoot

सच्चा मित्र पूत सपुत्तर

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सच्चा मित्र पूत सपुत्तर, बिगड़ी बात बनादे। नार सुपात्तर, बेटी चरित्तर, उजड़े घर को बसा दे ॥ टेक ॥ सच्चा मित्र भीड़ पड़ी मे, खड़ा साथ में पावे। हटा मित्र को, गलत रास्ते, सच्ची राह दिखावे। मित्र की बहन बेटी सम्मान की नजर लखावे। हारी-बीमारी खून पसीना, यार की साख बचावे। मित्र की इज्जत खातिर मित्र अपना सब लुटा दे ॥1॥ पूत सपूत अपने पुरखों की, इज्जत को बढ़ाता है। बूढ़े मात-पिता कर सेवा पुत्र धर्म निभाता है। घर की मान और मर्यादा का सच्चा पाठ पढ़ता है। दुख में हिम्मत ना हारे, कमाके कर्ज चुकाता है। रूके नहीं कुल की बाड़ी वो ऐसी बेल बढ़ादे ॥2॥ नार सुपात्तर ज्ञान में चात्तर अच्छी बातें करती हो। देर से सोकर उठे भौर चहूँ और सफाई करती हो। बड़े बूढ़े मेहमान को वो पहले खाना खिलाती हो। पति की सेवा मन मे दया सिर को पल्लू से ढकती हो। आ जाये इज्जत पे आंच काली बन खन्जर चला दे ॥3॥ अच्छी बेटी ना हो खोटी सच्ची बातें हो मन मे। ध्यान रहे अपनी मर्यादा पूरे कपड़े रहे तन मे। मात-पिता को बिना बताये जाये नही रात दिन में। पढ़ लिख कर गुणवान बने तो मान बढ़ाये जन जन में ॥4॥

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