Racha Hai Srishti Ko
रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने
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रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे हैं
रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे हैं
जो पेड़ हमने लगाया पहले, जो पेड़ हमने लगाया पहले
उसी का फल हम अब पा रहे हैं
रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे हैं ॥ टेक ॥
इसी धरा से शरीर पाए, इसी धरा में फिर सब समाए
इसी धरा से शरीर पाए, इसी धरा में फिर सब समाए
है सत्य नियम यही धरा का, है सत्य नियम यही धरा का
एक आ रहे हैं, एक जा रहे हैं
रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे हैं ॥1॥
जिन्होंने भेजा जगत में जाना, तय कर दिया लौट के फिर से आना
जिन्होंने भेजा जगत में जाना, तय कर दिया लौट के फिर से आना
जो भेजने वाले हैं यहाँ पे, जो भेजने वाले हैं यहाँ पे
वही फिर वापस बुला रहे हैं
रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे हैं ॥2॥
बैठे हैं जो धान की बालियों में, समाए मेहंदी की लालियों में
बैठे हैं जो धान की बालियों में, समाए मेहंदी की लालियों में
हर डाल, हर पत्ते में समाकर, हर डाल, हर पत्ते में समाकर
गुल रंग-बिरंगे खिला रहे हैं
रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे हैं ॥3॥
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