Nafrat Ki Deewar Ko Todo
नफरत की दीवार को तोड़ो
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नफरत की दीवार को तोड़ो, लड़ने में नहीं भलाई।
खुद भी जीओ, औरों को भी जीने दो मेरे भाई ॥ टेक ॥
इस जग में पैदा हुये तब, साथ में क्या लाये थे।
तन पे ना आभूषण कपड़े, सब नंगे ही आये थे।
यहाँ आके कहते ये मेरा, क्या कीमत चुकाये थे।
जिन चीजों पर आज लड़ो, कल होगी वो पराई ॥1॥
मोह के वश में हो लोगों को हमने लड़ते देखा है।
मन में रखकर भेदभाव, लोगों को मरते देखा है।
धन दौलत के चक्कर में, भाईयों को मरते देखा है।
झगड़ा करके पछताये, आँसू भी बहाते देखा है ॥2॥
अपने बल से क्यों किसी तुम निर्बल को सताते हो।
बेजुबान उन जानवरों को, मार-मार क्यों खाते हो।
धरम करम की आड़ ले के, क्यों तुम खून बहाते हो।
जीने का अधिकार सभी को, फिर क्यों पाप कमाते हो ॥3॥
सत्य और अहिंसा की अब पढ़ लो नई पढ़ाई।
जग में आये हो तो बन्दे, प्रेम करो हर प्राणी से।
सब से मीठा बोल सारे, जग को जीतो वाणी से।
सारा जग तुम्हे याद करे, अपने कर्मों की निशानी से।
अशोक पंछी गाव चोरी तेरा, मन की बात बताई ॥4॥
✍️ रचयिता: अशोक पंछी
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