Mukhda Kya Dekhe Darpan Mein
मुखड़ा क्या देखे दरपण में
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दया धरम का मूल है, और पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोड़ियो, जब तक घट में प्राण ॥ दोहा ॥
तेरे दया धरम नहीं मन में, मुखड़ा क्या देखे दरपण में ॥ टेक ॥
कागज की एक नाव बणाई, छोड़ी गहरा जल में।
धरमी धरमी पार उतर ग्या, पापी डूबे जल में, मुखड़ा क्या देखे दरपण में ॥1॥
पेंच बांधकर बांधे पगड़ी, तेल लगावे जुलफन में।
इण ताळी पे बांस उगेला, ढोर चरेला वन में, मुखड़ा क्या देखे दरपण में ॥2॥
आम की डाळी कोयल राजी, सुआ राजी वन में।
घरवाळी तो घर में राजी, तपसी राजी वन में, मुखड़ा क्या देखे दरपण में ॥3॥
खोटी कर के माया जोड़ी, जोड़ धरी बरतन में।
कहे कबीर सुणो भाई साधो, रेवे मन की मन में, मुखड़ा क्या देखे दरपण में ॥4॥
✍️ रचयिता: कबीर दास
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