Aaju Hari Dhenu Charae Aavat
आजु हरि धेनु चराए आवत
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इस भजन के बारे में
यह सुंदर भजन महाकवि सूरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के गोचारण से लौटने के मनमोहक दृश्य का वर्णन किया है। इस भजन का भावार्थ यह है कि जब श्री कृष्ण वन से गायें चराकर वापस लौट रहे हैं, तो उनके सिर पर मोर मुकुट, गले में वनमाला और शरीर पर पीतांबर लहरा रहा है। वे ग्वाल-बालों की बातों को ध्यान से सुनते हैं और अपनी मधुर वाणी से सबको आनंदित करते हैं। नंद बाबा, यशोदा मैया और रोहिणी जी अपने लाडले को गायों के साथ आता देख अत्यंत प्रसन्न हो रहे हैं। यह भजन भगवान के बाल-रूप और उनकी ब्रज लीलाओं के प्रति प्रेम को समर्पित है। भक्त इसे विशेष रूप से संध्या के समय या कृष्ण जन्माष्टमी जैसे उत्सवों पर गाते हैं। इसे गाने से मन में वात्सल्य भाव जागृत होता है और भक्त को साक्षात ब्रज की गलियों में कान्हा के साथ होने का दिव्य अनुभव प्राप्त होता है। यह भजन मन को शांति और प्रभु के प्रति अटूट भक्ति से भर देता है।
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