Chetavni Bhajan

Maut Bhi Jag Ke Logon Se

मौत भी जग के लोगों से

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मौत भी जग के लोगों से कितनी बेईमानी करती है। आती है ये चुपके से और खबर किसे ना करती है ॥ टेक ॥ आदमी को पता है जाना, फिर भी रहता वो अन्जान। जीवन की गफलत में फंसकर ना उसको रहता हैं ध्यान। ना मरने की झूठी तसल्ली देता है अपने ही कान। भूल जाता वो दुनिया में आया, दो दिन का मेहमान। चाहे छोटा हो या बड़ा ये नहीं किसी से डरती है ॥1॥ किधर से आये किधर को जाये, ना छोड़े निशानी। इसके कितने बने बहाने, उसकी थी ऐसे आनी। जिन्दगी तो दुख देती है पर बाद मौत ना परेशानी। इक झटके में काम खत्म कर, ना देखे कोई हानी। आसमान में उड़ते को भी, लाय जमीं पे धरती है ॥2॥ माना ये है बुरी चीज पर इसकी भी मजबूरी है। ये ना आये तो ये धरती होय बोझ से भारी है। इसके बिना कोई किसे ना समझे इसका डर जरूरी है। तड़प तड़प के कहे आदमी कब लेगी मेरी बारी है। कितनों को मारे इसने पर खुद ये कभी ना मरती है ॥3॥ इसको कोई जेल करे ना कोई मुकदमा चलता है। नम्बर से ना मारे ये मनमर्जी सौदा खलता है। जिसको ये उठाना चाहे ना उसका नम्बर टलता है। अशोक पंछी कहे आदमी रोज मौत से लड़ता है। आना जाना लगा रहे और जगह सभी की भरती है ॥4॥

✍️ रचयिता: अशोक पंछी

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