Mat Le Re Jivda
मत ले रे जिवड़ा
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सूता सूता क्या करो, और सूता ने आवे नींद।
जम सिरहाणे आय खड़ा, ज्यूं तोरण आया बींद ॥ दोहा
मत ले रे जिवड़ा, ओ नींद हरामी, नींद हरामी।
थोड़ा जीणा रे खातिर कांई सोवे,
थोड़ा जीणा रे खातिर कांई सोवे रे,
मिनख जमारो कांई खोवे रे।
मत ले रे जिवड़ा, ओ नींद हरामी, नींद हरामी,
थोड़ा जीणा रे खातिर कांई सोवे ॥ टेक ॥
इण काया में घोर अंधेरो, घोर अंधेरो,
पर घर दिवला कांई जोवे रे।
मत ले रे जिवड़ा, ओ नींद हरामी ॥1॥
इण काया में खान हीरां री, खान हीरां री,
करम काकरिया ने कांई रोवे रे।
मत ले रे जिवड़ा, ओ नींद हरामी ॥2॥
इण काया में बाग चंदन रा, बाग चंदन रो,
बीज बावलिया रो कांई बोवे रे।
मत ले रे जिवड़ा, ओ नींद हरामी ॥3॥
इण काया में घोर अंधेरो, घोर अंधेरो,
पर घर दिवला कांई जोवे रे।
मत ले रे जिवड़ा, ओ नींद हरामी ॥4॥
इण काया में सागर भरियो, सागर भरियो,
कादा में कपड़ा कांई धोवे रे।
मत ले रे जिवड़ा, ओ नींद हरामी ॥5॥
कहत कबीर रामजी ने भज ले, रामजी ने भज ले,
अंत समय में पड़ियो रोवे रे।
मत ले रे जिवड़ा, ओ नींद हरामी ॥6॥
✍️ रचयिता: कबीरदास
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