कहे दास सग्राम, हाथ में हीरा आया।
पड़ी नांहि पिछाण, घाल गोफण में वाया।
वावत वावत वाय दिया, और लारे बचियो एक।
आया हीरां रा पारखी, जद रोयो माथो टेक।
रोयो माथो टेक, एड़ा मैं घणा ही गमाया।
कहे संत सग्राम, हाथ में हीरा आया ॥ छंद
मैं तो हीरो गमा दियो कचरा में, कचरा में।
पांच पचीसा रा झगड़ा में ॥ टेक ॥
अगम बतावे कोई पिछम बतावे, अगम बतावे कोई पिछम बतावे।
कोई बतावे पाणी पतरा में, पतरा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में।
मैं तो हीरो गमा दियो कचरा में, कचरा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में ॥1॥
तीरथ बतावे कोई वरत बतावे, तीरथ बतावे कोई वरत बतावे।
कोई बतावे माळा जपणा में, जपणा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में।
मैं तो हीरो गमा दियो कचरा में, कचरा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में ॥2॥
ऋषि मुनि और पीर ओलिया, ऋषि मुनि और पीर ओलिया।
काया गमा दी इण नळरा में, नळरा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में।
मैं तो हीरो गमा दियो कचरा में, कचरा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में ॥3॥
जोगी होय जुगत नहीं जाणे, जोगी होय जुगत नहीं जाणे।
जैसे है अग्नि लकड़ा में, लकड़ा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में।
मैं तो हीरो गमा दियो कचरा में, कचरा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में ॥4॥
धरमीदास जी ने हीरो लादो, धरमीदास जी ने हीरो लादो।
जाय धर दीनो हंसला में, हंसला में, पांच पचीसा रा झगड़ा में।
मैं तो हीरो गमा दियो कचरा में, कचरा में, पांच पचीसा रा झगड़ा में ॥5॥
✍️ रचयिता: संत सग्राम
इस भजन के बारे में
यह भजन संत संग्राम जी द्वारा रचित है, जिसमें 'हीरा' मनुष्य जीवन और आत्म-ज्ञान का प्रतीक है। इसका भावार्थ यह है कि हमें यह दुर्लभ मानव जीवन ईश्वर की भक्ति के लिए मिला था, लेकिन हम सांसारिक मोह-माया, काम, क्रोध और अहंकार जैसे 'पांच पचीसा' के झगड़ों में उलझकर इसे व्यर्थ ही गँवा रहे हैं। जिस प्रकार कचरे में हीरा पहचानने की समझ न होने पर उसे फेंक दिया जाता है, उसी प्रकार हम बाहरी आडंबरों, तीर्थों और कर्मकांडों में भटककर अपने भीतर छिपे परमात्मा को नहीं पहचान पा रहे हैं।
यह भजन हमें आत्म-चिंतन करने की प्रेरणा देता है। भक्त इसे तब गाते हैं जब वे संसार की नश्वरता को समझकर अपने मन को प्रभु की ओर मोड़ना चाहते हैं। इसे गाने का उद्देश्य अपनी भूलों पर पछतावा करना और सच्चे गुरु की शरण में जाकर आत्म-साक्षात्कार की राह खोजना है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि जीवन का असली उद्देश्य बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि अपने भीतर के 'हंस' यानी आत्मा को पहचानकर उसे परमात्मा में विलीन करने में है।