Main Nahin Makhan Khayo
मैं नहिं माखन खायो
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मैं नहिं माखन खायो मैया मोरी,
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥ टेक ॥
भोर भयो गैयन के पाछे,
मधुवन मोहिं पठायो,
चार पहर बंसीवट भटक्यो,
साँझ परे घर आयो ॥1॥
मैं बालक बहियन को छोटो,
छींको किहि बिधि पायो,
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं,
बरबस मुख लपटायो ॥2॥
तू जननी मन की अति भोरी,
इनके कहे पतिआयो,
जिय तेरे कछु भेद उपजि है,
जानि परायो जायो ॥3॥
यह लै अपनी लकुटि कमरिया,
बहुतहिं नाच नचायो,
'सूरदास' तब बिहँसि जसोदा,
लै उर कंठ लगायो ॥4॥
✍️ रचयिता: सूरदास
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