Chetavni Bhajan

Laga Re Baan Mhare Shabad Guran Ra

लागा रे बाण म्हारे शब्द गुरां रा

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साधु ने झोलो शब्द को, नर ने झोलो नार। दीपक झोलो पवन को, भाई किणविध उतरे पार ॥ दोहा साधु ने तो शब्द मिले और, नर ने चतुर नार। दीपक ने परतो मिले, भाई किणविध उतरे पार ॥ साधु शब्दां परखिये रे, बिखो पड़ यां धरनार। शूरा जद ही परखिये, भाई रण बाजे तलवार ॥ शब्दां मारया मर गया रे, शब्दां छोड़यो राज। जिण-जिण शब्द विचारिया, भाई वांगा सरिया काज ॥ लागा रे बाण म्हारे शब्द गुरां रा, सैल सतगुरुजी रा, घायल हुवे ज्यां री ए बातां ॥ टेक ॥ परणी नार पिया गम जाणे, काँई जाणे नार कँवारी बातां। बिना विवेक वा फिरे रे भटकती, इग कारण वा खावे लातां। लागा रे बाण म्हारे शब्द गुरां रा ॥1॥ पतिव्रता नार भई बुधवन्ती, वा जाणे नार पिवजी री बातां। भिड़िया अंग भरम सब भागा, भूल गई कुबदा री बातां। लागा रे बाण म्हारे शब्द गुरां रा ॥2॥ धरा असमान भले डिग जावे, सूख जावे समदर सारा। मैं म्हारा पिवजी ने कदे नहीं भूलूं, पाव पलक ने दिन राता। लागा रे बाण म्हारे शब्द गुरां रा ॥3॥ प्रेम पोळ में सतगुरु पोदिया, मिलवा री लग रही बातां। गुरु प्रताप रविदास बोले, तारमतार मिलाई दाता। लागा रे बाण म्हारे शब्द गुरां रा ॥4॥

✍️ रचयिता: रविदास

इस भजन के बारे में

यह भजन महान संत रविदास जी द्वारा रचित है, जिसमें 'शब्द' को गुरु के बाण के समान बताया गया है। यहाँ 'बाण' का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि वह दिव्य ज्ञान है जो शिष्य के हृदय को छूकर उसके भीतर के अहंकार और अज्ञान को मिटा देता है। जिस प्रकार एक घायल व्यक्ति की स्थिति बदल जाती है, उसी प्रकार गुरु के उपदेशों को सुनकर भक्त का मन सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर प्रभु की भक्ति में लीन हो जाता है। यह भजन हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो हमारे भीतर के भ्रम को दूर कर दे।

संत रविदास जी इस भजन में एक पतिव्रता स्त्री का उदाहरण देते हैं, जो अपने पति के प्रति पूर्ण समर्पित होती है। ठीक वैसे ही, एक सच्चा साधक अपने सतगुरु के वचनों को अपने जीवन का आधार बना लेता है। भक्त कहता है कि चाहे पूरी सृष्टि डगमगा जाए, पर वह अपने प्रभु को कभी नहीं भूलेगा। इस भजन को अक्सर सत्संग या ध्यान के समय गाया जाता है, ताकि मन में गुरु के प्रति अटूट विश्वास और प्रेम जागृत हो सके। इसे गाने से मन की चंचलता शांत होती है और व्यक्ति को आत्म-साक्षात्कार की प्रेरणा मिलती है।

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