Kuch To Apni Maut Mare
कुछ तो अपनी मौत मरे
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यहीं चलाएँ · Play here
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कुछ तो अपनी मौत मरे और कुछ को मार रहा इन्सान।
कुछ अनहोनी मर जाते पर देते दोष सदा भगवान।। दोहा
पी के शराब चलाये गाड़ी, खुद मरे और को मार रहे।
फसल उगाये डाल दवाई, जहर खिला के मार रहे।
गली-गली मदिरा की दुकाने, पिला-पिला के मार रहे।
नये-नये हथियार बनाके, घाट मौत के उतार रहे।
इक दूजे को गिरा रहे अब, बना मौत के खुद सामान ॥1॥
भूख गरीबी तंग आकर के, जग से पिण्ड छुड़ाते है।
धोखा खाकर पागल प्रेमी, प्रेम में जान खपाते है।
घर में कलह परेशान होय के, खुद के आग लगाते है।
लुट जाये जब घर की आबरू, घुट-घुट प्राण गंवाते है।
कई जिन्दगी से दुख पाते है, मर्जी से छोड़े जगत जहान ॥2॥
आये भूकम्प और गिरे इमारत, अनहोनी मर जाते है।
बरसे पानी आये प्रलय, बहते जल में मर जाते है।
आकाश से पड़ जाये बिजली, जल-जल के मर जाते है।
आ जाये आँधी काली, सर टकराकर मर जाते है।
अनहोनी घिर जाते है, जो पल में खो दे नामोनिशान ॥3॥
पूरी उम्र बेकार बुढ़ापा, भगवान तो बस उनको मारे।
बाकी काम करता है जीव जो, जीव-जीव को खुद मारे।
अपनी गलती छुपाने खातिर, भगवान को दोष देते सारे।
अपनी खाई खोद आदमी, छोड़ जगत से सब हो रहे।
अशोक पंछी कहे प्यारे, झूठा ना किसे करो बदनाम ॥4॥
✍️ रचयिता: अशोक पंछी
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