Chetavni Bhajan

Kaya Nagar Re Beech Mein

काया नगर रे बीच में

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कोयलड़ी काली घणी, मीठा थारा वेण। किण विध तू काली पड़ी, किण विध राता नैण। सांवरा, थारा किण विध राता नैण। बाग बगीचा में फिरी, और मिल्यो नहीं मन को मैण। कळप कळप काली पड़ी, म्हारा रॉय रॉय राता नैण। सांवरा, म्हारा रॉय रॉय राता नैण॥ दोहा॥ काया नगर रे बीच में रे, लेहरिया लम्बा पेड़ खजूर। चढ़े तो मेवा चाख लो रे, पड़े तो चकनाचूर। भजन में खुब रमणा रे, लेहरिया हरी सूं राखो हेत। प्याला भर-भर पीवणा रे, लेहरिया लागी हरि सूं डोर॥ टेक॥ शबद कटारी बाकड़ी रे, लेहरिया गुरुगम री तलवार। अविनाशी री फौज में रे, कदे नी आणो हार। भजन में खुब रमणा रे, लेहरिया हरी सूं राखो हेत॥1॥ माखी बैठी शहद पे रे, लेहरिया पंखुड़ियाँ लिपटाय। उड़ने रा सांसा पड़या रे, लालच बुरी रे बलाय। भजन में खुब रमणा रे, लेहरिया हरी सूं राखो हेत॥2॥ जन्तर पड़िया जोजरा रे, लेहरिया टूट गई सब तार। तार बिचारो काँहि करे रे, गयो रे बजावण हार। भजन में खुब रमणा रे, लेहरिया हरी सूं राखो हेत। हो प्याला भर-भर पीवणा रे, लेहरिया लागी हरि सूं डोर॥3॥ धमण धुखे गोळा तपे रे, लेहरिया धड़-धड़ पड़े रे जंजीर। रमानन्द री फौज में रे, सनमुख लड़े रे कबीर। भजन में खुब रमणा रे, लेहरिया हरी सूं राखो हेत। हो प्याला भर-भर पीवणा रे, लेहरिया लागी हरि सूं डोर॥4॥

✍️ रचयिता: कबीर

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