Jiski Jaisi Soch Ho
जिसकी जैसी सोच हो वैसी दुनिया देती दिखाई
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जिसकी जैसी सोच हो वैसी दुनिया देती दिखाई।
ये दुनिया है एक दर्पण जिस नजर से देखो भाई ॥ टेक ॥
सज्जन को तो ये सारा जग, धरम करम घर लगता है
साधू को वैराग्य भला, भगवान भजन नित करता है
ज्ञानी को चिन्तन दुनिया, कुछ नया खोजता रहता है
क्रोधी दुनिया एक अखाड़ा, बात-बात में लड़ता है
जैसे को वैसा मिल जाये, जग में रीत घली आई ॥1॥
राह चलती नारी लोगों कई रूप में दिख जाती है
किसी नजर माँ बहन किसी के नजर बुराई पाती है
जैसा आदमी सोचाता है नीयत वैसी बन जाती है
किसी नजर से देख रहा वो नजर जुबां पे आती है
किसी नजर में घड़ा पाप का, किसी में काम भलाई ॥2॥
नजर चोर की दुनिया तिजोरी, लूटने का एक खजाना है
मयखाना है नजर शराबी खुद पीओं और पिलाना है
पापी को तो पाप ही दिखता, मरना और मारना है
बात-बात में शक करना, उस नर का नहीं, ठिकाना है
दुनिया सुन्दर उस नजर दिखे, जिस नजर में हो सच्चाई ॥3॥
खुद की नजर मत, गिरना लोगो साफ करो, अपने मन को
सारा जग अपने जग वाले, नजर से देखो हर दिन को
सुबह उठ धन्यवाद करे, अपने-अपने तो भगवान को
साफ नजर से तुम देखो, दुनिया रूपी इस उपवन को
अशोक पंछी नजर भजन मे भजनों की दुनिया बसाई ॥4॥
✍️ रचयिता: अशोक पंछी
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