Chetavni Bhajan

Jeev Tu Mat Karna Fikri

जीव तू मत करना फिकरी

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यहीं चलाएँ · Play here
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हरी भुलों नी जग छोड़ा, करम करो जिन्दगानी में। दुनियाँ में ऐसे रेवो, ज्यूँ कमल रहता है पानी में ॥ चित शुद्ध कर लीजिए रे, चंचलता मिट जाय। प्रभु अपने निज रूप में, लीजो मोहे मिलाय ॥ दोहा हो जीवड़ा मत करना फिकरी, जीवड़ा मत करना फिकरी। भाग लिखी सो होय रहेगी, भली बुरी सगरी। हो जीवड़ा मत करना फिकरी ॥ टेक ॥ तप करके हिरणाकुश आयो, वर पायो जबरी। जीवड़ा, वर पायो जबरी। लोहे लकड़ मे मरियो नाहीं, मरियो मौत नख री। हो जीवड़ा मत करना फिकरी ॥1॥ सहम पुव राजा सागर के होता, तप कीनो अकरी। जीवड़ा, तप कीनो अकरी। थारी गती ने थूं ही जाणे, आग मिली ना लकड़ी। हो जीवड़ा मत करना फिकरी ॥2॥ तीन लोक री माता सीता, रावण जाय हरी। जीवड़ा, रावण जाय हरी। ओ जब लक्ष्मणे ने लंका घेरी, लंका गई बिखरी। हो जीवड़ा मत करना फिकरी ॥3॥ आठ पहर सायब को रटना, ना करणा जिकरी। ना करणा जिकरी। कहत कबीर सुनो भाई साधो, रहणा बेफिकरी। हो जीवड़ा मत करना फिकरी ॥4॥

✍️ रचयिता: कबीर

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