Chetavni Bhajan

Jal Nabh Thal Agni Vayu

जल नभ थल अग्नि वायु

👁 5 views
यहीं चलाएँ · Play here
Text size:
जल नभ थल, अग्नि वायु के, कण-कण में मिल जाता है। अन्दर बाहर, सभी जगहॉ पर, नजर किसे ना आता है ॥ टेक ॥ जड़ भी तू, शाखा भी तू, पात-पात हर डाली तू। खिले फूल पर, भँवरा तू, चमन खुशबू और लाली तू। ठण्डी पवन, आँधी भी तू, उजला दिन रात, काली तू। बादल और बरसात भी तू, बहता जल अम्बर खाली तू। खेतों में हरियाली तू, हाली बन हल भी चलाता है ॥1॥ कीड़ी को कण, हाथी को मण, जीव जीव को खिला रहा। पक्षियों संग, दाना-खा, उड़ने को पंख, हिला रहा। पिता बन राँह, दिखा रहा, और मां बन दूध पिला रहा। खुशियाँ दे के, हँसा रहा कभी, दुख दे के तू रूला रहा। कर्मों का लेखा मिला रहा और तू सबका बही खाता है ॥2॥ धनवानों के महलों में पर, निर्धन धर बसेरा है। किसकों देना, किससे लेना, सौदा मर्जी का तेरा है। जन्म भी देता, मरण भी देता, कब देगा तुझे बेरा है। तेरे हाथों डोर सभी की, हर कोई तेरा मोहरा है। घर-घर तेरा डेरा है, तू ही जागे तू सोता है ॥3॥ कोयल की कूहूं-कूहूं में, बनके बाँसुरी सुना रहा। मन्दिर के हर सतसंग में सूरताल बन गुनगुना रहा। रूठ जाये कोई भक्त तेरा तू खिला के माखन मना रहा। दुष्टों का संहार कर जग में तेरा होना जना रहा। अशोक पंछी भुना रहा, पर गीत सभी तू गाता है ॥4॥

✍️ रचयिता: अशोक

Related Bhajans