Chetavni Bhajan

Gurudev Daya Karke

गुरुदेव दया करके

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गुरुदेव दया करके, मुझको अपना लेना। मैं शरण पड़ा तेरी, चरणों में जगह देना ॥ टेक ॥ करुणा निधि नाम तेरा, करुणा दिखलाओ तुम। सोए हुए भाग्यों को, हे नाथ जगाओ तुम। मेरी नाव भंवर डोले, उसे पार लगा देना ॥1॥ तुम सुख के सागर हो, निर्धन के सहारे हो। इस तन में समाए हो, मुझे प्राणों से प्यारे हो। नित माला जपूं तेरी, नहीं दिल से भुला देना ॥2॥ पापी हूं या कपटी हूं, जैसा भी हूं तेरा हूं। घर बार छोड़कर मैं, जीवन से खेला हूं। दुःख का मारा हूं मैं, मेरा दुखड़ा मिटा देना ॥3॥ मैं सबका सेवक हूं, तेरे चरणों का चेरा हूं। नहीं नाथ भुलाना मुझे, इस जग में अकेला हूं। तेरे दर का भिखारी हूं, मेरे दोष मिटा देना ॥4॥

इस भजन के बारे में

यह हृदयस्पर्शी भजन गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और उनकी कृपा पाने की व्याकुलता को दर्शाता है। इसमें भक्त अपने गुरु से प्रार्थना करता है कि वह उसे अपनी शरण में ले लें, क्योंकि गुरु ही करुणा के सागर और निर्धन के एकमात्र सहारे हैं। भक्त अपनी कमियों और दुखों को स्वीकार करते हुए गुरु से विनती करता है कि वे उसके सोए हुए भाग्य को जगाएं और जीवन रूपी भंवर में फंसी उसकी नाव को पार लगाएं। यह भजन गुरु-शिष्य परंपरा के उस अटूट विश्वास का प्रतीक है, जहाँ भक्त मानता है कि गुरु ही उसके प्राणों से प्यारे हैं और केवल वही उसके दोषों को मिटाकर उसे सही राह दिखा सकते हैं। भक्त इस भजन को तब गाते हैं जब वे जीवन में दुखी या अकेला महसूस करते हैं और गुरु से मार्गदर्शन व शांति की कामना करते हैं। इसे किसी भी समय, विशेषकर ध्यान या प्रार्थना के दौरान गाया जा सकता है। इसे गाने से मन में शांति का अनुभव होता है और साधक को यह विश्वास मिलता है कि गुरु की कृपा से उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। यह भजन अहंकार को त्यागकर गुरु के चरणों में झुकने का एक सुंदर माध्यम है।

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