Chetavni Bhajan

Guru Bin Ghor Andhera Santo

गुरु बिन घोर अँधेरा संतो

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गुरु बिन घोर अँधेरा संतो, गुरु बिन घोर अँधेरा जी। बिना दीपक मंदिर सूना, अब नहीं वस्तु का वेरा हो जी ॥ टेक ॥ जब तक कन्या रहे कुंवारी, नहीं पुरुष का वेरा जी। आठों पहर आलस में खेले, अब खेले खेल घनेरा हो जी ॥1॥ मृग की नाभि बसे कस्तूरी, नहीं मृग को वेरा जी। रनी वनी में फिरे भटकता, अब सूंघे घास घणेरा हो जी ॥2॥ जब तक आग रहे पत्थर में, नहीं पत्थर को वेरा जी। चकमक चोट लगे शब्द की, अब फेंके आग चहुंफेरा हो जी ॥3॥ रामानंद मिलिया गुरु पूरा, दिया शब्द तत्सारा जी। कहत कबीर सुनो भाई संतो, अब मिट गया भरम अँधेरा हो जी ॥4॥

✍️ रचयिता: कबीर दास

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