Chetavni Bhajan

Guran Sa Olun Aap Ri Aave

गुरां सा ओळूं आप री आवे

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शीलवंत सुजन जन, हरदे प्रेम प्रकाश। श्लोक गुरां सा ओळूं आप री आवे, याद करूं जद रहो हृदय में, पल पल प्रेम सतावे ॥ टेक ॥ चैत्र महिने चिन्ता लागी, गुरू बिना कौन मिटावे, ओर दवाई म्हारे काम नहीं आवे, शब्दां सूं रोग कटावे ॥1॥ खिल रहे फूल छिटक रही कलियां, भंवर वासना लेवे, जेठ महिने ऋतु गर्मी री, जल बिना मीन दुख पावे ॥2॥ आप गुरांसा इन्द्र समाना, होय बादल बरसावे ॥3॥ आषाढ़ा में आशा लागी, पपीहा शोर मचावे, आप गुरांसा अमृत बूंदा, भर भर प्याला पावे ॥4॥ श्रावण में साहेब घर आया, सखियां मंगल गावे, सुमरण थाल लिया दोय हाथां, मोतियां हर्ष बधावे ॥5॥ भाद्रवो भक्ति रो महिनो, गुरू बिना कुण समझावे, धर्मदास जी री अर्ज साहेब ने, चरणां में शीश निवावे ॥6॥

✍️ रचयिता: धर्मदास जी

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