Chetavni Bhajan

Gagan Par Desh Hamara

गगन पर देश हमारा

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गगन पर देश हमारा, चले तो साहिब मिल जाय टेर ॥ टेक ॥ पांच तत्व तीन गुण नीचा, तापर अलगा लखाय। तीन लोक पर अमर अखाड़ा, काल भी डर जाय ॥1॥ भणिया गुनिया दोनों तकिया, समझौड़ा उलझजाय। स्वर्ग नरक की गेल में, फिर फिर गोता खाय ॥2॥ निराकार आकार नहीं, सगुण निर्गुण नाय। चवहदा लोग अगम के आगे, हंस रहा लिपटाय ॥3॥ रामानंद मोहे सतगुरु मिलिया, दिया भेद बताएय। कहत कबीर सुनो भाई साधो, आवागमन मिट जाय ॥4॥

✍️ रचयिता: कबीर

इस भजन के बारे में

यह भजन संत कबीरदास जी द्वारा रचित है, जिसमें उन्होंने उस परम धाम का वर्णन किया है जो इस नश्वर संसार और पांच तत्वों से परे है। कबीर साहिब समझाते हैं कि ईश्वर का वास्तविक निवास स्थान किसी भौतिक लोक में नहीं, बल्कि उस निराकार अवस्था में है जहाँ काल का भी भय नहीं होता। यह भजन हमें याद दिलाता है कि स्वर्ग-नरक के चक्कर और सांसारिक उलझनों से ऊपर उठकर ही उस 'अमर अखाड़े' या सत्य लोक को पाया जा सकता है, जहाँ आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है।

संत कबीर कहते हैं कि जब सद्गुरु की कृपा होती है, तभी इस रहस्य का भेद खुलता है और जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। भक्त इस भजन को मुख्य रूप से सत्संग, ध्यान या आत्म-चिंतन के समय गाते हैं। इसे गाने का भाव यह है कि मन को बाहरी आडंबरों से हटाकर भीतर की उस अगम गहराई में ले जाया जाए, जहाँ आत्मा अपने मूल स्वरूप को पहचान सके। यह भजन साधक को वैराग्य और आत्म-ज्ञान की ओर प्रेरित करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और शांतिदायक पद है।

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