Chetavni Bhajan

Chalo Mhara Bhaiyada Desh Parayo Chhodo Re

चालो म्हारा भाईड़ा, देश परायो छोड़ो रे

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सतगुरु और पारस में, बहुत आंतरो जान। पारस तो कंचन करे, गुरु करले आप समान।। दोहा चालो म्हारा भाईड़ा, देश परायो छोड़ो रे, गुरु जी बुलावे अपना देश मे।। ॥ टेक ॥ इस देश का लोग लड़ाकू, दया धर्म है थोड़ो रे, काल तो आवेला किसी भेष में।। ॥1॥ डाकू आया शहर में, रेण दिवस कर दोड़ो रे, दुनिया तो बस गई रे पांचों कोस में।। ॥2॥ आशा तृष्णा बढ़ती जावे, भजन करो दिन थोड़ो रे, जीवन तो बित्यो रे पंच क्लेश में।। ॥3॥ काम क्रोध उबा मोर ज्यूँ, संग पाप को घोड़ो रे, ध्यान धीरज तो राखो साथ मे।। ॥4॥ गोकुल स्वामी अन्तर्यामी, संग लादूदास को जोड़ो रे, सतगुरु जी ले जावे सत्संग रेल में।। ॥5॥

✍️ रचयिता: लादूदास

इस भजन के बारे में

यह भजन संत लादूदास जी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली चेतावनी भजन है। इसमें 'देश परायो' का अर्थ इस नश्वर संसार से है, जहाँ हम मोह-माया में उलझकर रह गए हैं। संत हमें सचेत करते हैं कि यह संसार हमारा वास्तविक घर नहीं है, बल्कि यहाँ काम, क्रोध और तृष्णा जैसे विकारों का वास है। गुरु हमें इस मायावी संसार को छोड़कर अपने निज स्वरूप यानी 'अपने देश' (आध्यात्मिक लोक) की ओर चलने का मार्ग दिखाते हैं।

इस भजन का मुख्य भाव यह है कि मनुष्य को क्षणभंगुर जीवन की वास्तविकता को समझना चाहिए। यहाँ के लोग और परिस्थितियाँ अस्थाई हैं, और काल किसी भी रूप में आकर हमें ले जा सकता है। इसलिए, सांसारिक दौड़-धूप छोड़कर गुरु की शरण में जाना और सत्संग के माध्यम से आत्म-कल्याण करना ही एकमात्र उपाय है।

भक्त इस भजन को विशेष रूप से सत्संग, एकांत साधना या मन को संसार से विरक्त करने के लिए गाते हैं। इसे गाने से मन में वैराग्य जागृत होता है और प्रभु भक्ति की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि गुरु ही वह शक्ति हैं जो हमें इस भवसागर से पार ले जाकर सत्य के मार्ग पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।

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