Chetavni Bhajan

Bharti Hoja Re Satsang Mein

भरती होजा रे सत्संग में

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भरती होजा रे सत्संग में थारो भाग खुलेला रे ॥ टेक ॥ जनम मरण को देश परायो मृत्यु वेला रे, सुंदर काया कंचन थारी छोड़ चलेला रे ॥1॥ कर पुरसारथ ज्ञान गरीबी गुरुगम मेला रे, सत्संग धार हियो मत हारे मौज मिलेला रे ॥2॥ अमृत सिंधु सुखसागर भरियो प्रेम हिलोला रे, प्रेम की छमकी मारे रे हंसा मोती चुगेला रे ॥3॥ लखमी राम म्हाने सतगुरु मिलिया दीन दयाला रे, हरि राम हरि भक्ति कर ले कारज सरेला रे ॥4॥

✍️ रचयिता: लखमी राम

इस भजन के बारे में

यह भजन संत लक्ष्मी राम जी द्वारा रचित है, जो हमें सत्संग की महिमा और जीवन के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाता है। इसका भावार्थ यह है कि यह संसार नश्वर है और मृत्यु निश्चित है, इसलिए मनुष्य को व्यर्थ के मोह-माया में न फंसकर सत्संग के मार्ग पर चलना चाहिए। सत्संग ही वह स्थान है जहाँ ज्ञान और भक्ति का अमृत मिलता है, जिससे आत्मा का कल्याण होता है।

इस भजन में गुरु की कृपा को सर्वोपरि माना गया है। भक्त को प्रेरित किया गया है कि वह अहंकार त्यागकर गुरु के सानिध्य में आए, क्योंकि वही जीवन के दुखों को दूर करने वाले हैं। जब भक्त प्रेम और विनम्रता के साथ सत्संग में शामिल होता है, तो उसे आत्मिक शांति और प्रभु की भक्ति का सुख प्राप्त होता है।

भक्त इस भजन को विशेष रूप से सत्संग सभाओं, एकांत साधना या मन की शांति के लिए गाते हैं। इसे गाने का मुख्य उद्देश्य सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर ईश्वर के प्रति समर्पित होना है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि सत्संग में जुड़ना ही जीवन को सफल बनाने का सबसे सरल और उत्तम उपाय है।

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