Amar Lok Kun Jasi Re Santo
अमरलोक कुण जासी रे सन्तों
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अमरलोक कुण जासी रे सन्तों, पाँच तत्त्व री बणी कोठड़ी, आ तो बिखर जासी, सन्तों ! अमरलोक कुण जासी ॥ टेक ॥
कुण है ठाकर कुण है चाकर, कुण है आगे दासी ।
कौण पुरुष री फिरे दुहाई, कौण नगर रो वासी ॥1॥
मन है ठाकर तन है चाकर, दस इन्द्रियाँ दासी ।
अविनाशी री फिरे दुहाई, हंस नगरियां रो वासी ॥2॥
कुण है गुरु कुण है चेला, कुण पुरुष अविनाशी ।
कहो हंसा तुम किसे कहत हो, बात बतावो साँची ॥3॥
शबद गुरु ने सुरत चेला, अमर पुरुष अविनाशी ।
हंसा उलट सोहम होत हैं, पार ब्रह्म परकाशी ॥4॥
गुरु जोरावर पूरा मिलिया, बात बताई म्हाने साँची ।
हेमनाथ सतगुरु जी रे शरणे, संत अमरापुर जासी ॥5॥
✍️ रचयिता: हेमनाथ
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