Aisa Mera Satguru Khel Rachaya
ऐसा मेरा सतगुरु खेल रचाया
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ऐसा मेरा सतगुरु खेल रचाया
खबर करो खिलका मांही ख्याली, आप अलख लखवाया ॥ टेक ॥
कर चौकस चेतन की चौकी, अरध उरध सुलझाया
उल्टा पवन कंवल मांही पल्टिया, बंकनाल रस लाया ॥1॥
इडा पिंगला होयकर भेली, सुखमण सहज मिलाया
लग रही तार त्रिवेणी छाजे, अजब झरोके आया ॥2॥
वो रंग राग हुई रंग महला, गगन मंडल गरजाया
सुरत निरत दोंऊ अर्धंग्या, मिलकर मंगल गाया ॥3॥
मिल रहा जीव शिव के मांही, एक रूप निज थाया
कहे बन्नानाथ सुणो भाई साधु, लगे ना जम का दाया ॥4॥
✍️ रचयिता: बन्नानाथ
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