
यशोदा के यहाँ योगमाया का जन्म और उसका कंस के हाथ से छूटना
Yashoda Ke Yahan Yogmaya Ka Janm Aur Uska Kans Ke Haath Se Chhutna
जिस पावन रात्रि को मथुरा के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण अवतरित हुए, उसी रात्रि गोकुल में नन्दराय के घर माता यशोदा ने एक तेजस्वी कन्या को जन्म दिया। यह कन्या साधारण नहीं थी — यह स्वयं भगवान की अलौकिक शक्ति योगमाया थीं, जो प्रभु की लीला को पूर्ण करने और अधर्मी कंस को उसकी नियति की चेतावनी देने के लिए इस रूप में प्रकट हुई थीं। यशोदा प्रसव के बाद योगनिद्रा में मग्न थीं और उन्हें यह भान भी न रहा कि उनका शिशु पुत्र है या पुत्री।
उधर वसुदेव यमुना पार कर गोकुल पहुँच चुके थे। योगमाया के प्रभाव से नन्द के घर के सभी लोग गहरी निद्रा में डूबे थे। वसुदेव ने अत्यन्त कोमलता से दिव्य शिशु श्रीकृष्ण को यशोदा की शय्या पर लिटा दिया और उनके पास सोई हुई उस कन्या को उठाकर अपनी गोद में ले लिया। फिर वे उसी अंधकार और वर्षा में यमुना पार कर पुनः मथुरा के कारागार में लौट आये। लौटते ही उन्होंने कन्या को देवकी के पास रखा, और तत्क्षण द्वार पुनः बन्द हो गये, बेड़ियाँ फिर से जुड़ गयीं और पहरेदार अपनी निद्रा से जाग उठे — मानो कुछ हुआ ही न हो।
नवजात कन्या का रुदन सुनते ही पहरेदार सतर्क हो गये और भागकर कंस को समाचार दिया कि देवकी का आठवाँ सन्तान जन्म ले चुका है। यह सुनते ही कंस, जो वर्षों से इसी आठवीं सन्तान से भयभीत था, आधी रात को व्याकुल होकर कारागार की ओर दौड़ पड़ा। भय और क्रोध से उसका विवेक जाता रहा था।
देवकी ने अपने भाई के चरण पकड़कर करुण प्रार्थना की — "हे भ्राता! यह तो एक निर्दोष कन्या है। तुम्हें तो पुत्र से भय था; इस बालिका को मुझे दे दो, इसे मत मारो।" किन्तु निष्ठुर कंस पर बहन के आँसुओं का कोई प्रभाव न पड़ा। उसने बलपूर्वक वह कन्या देवकी की गोद से छीन ली और उसे शिला पर पटककर मार डालने के लिए उठाया।
किन्तु जैसे ही कंस ने कन्या को पटकना चाहा, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और वहीं अपने दिव्य अष्टभुजा रूप में प्रकट हो गई। शस्त्रों से सुसज्जित, दिव्य आभूषणों से अलंकृत उस देवी योगमाया ने गरजते हुए कहा — "हे मूर्ख कंस! मुझे मारने से तुझे क्या लाभ? तेरा वध करने वाला तो जन्म ले चुका है और सुरक्षित स्थान पर पल रहा है। अब व्यर्थ में निर्दोष शिशुओं पर अत्याचार करना छोड़ दे।" इतना कहकर देवी अन्तर्धान हो गईं।
यह वाणी सुनकर कंस स्तब्ध रह गया। उसे समझ आ गया कि विधि का विधान अटल है और उसका काल कहीं-न-कहीं पल रहा है। किन्तु अहंकारी होने के कारण वह न सुधरा, बल्कि और भी सशंकित होकर अत्याचार के नये मार्ग खोजने लगा। दूसरी ओर गोकुल में नन्द-यशोदा के आँगन में साक्षात् परमात्मा शिशु-रूप में हँसते-खेलते हुए पल रहे थे।
इस कथा की महिमा यही है कि प्रभु की योगमाया अजेय है और अधर्मी का विनाश उसकी अपनी नियति में निश्चित रहता है। भक्तों के लिए यह आश्वासन है कि परमात्मा अपने भक्तों की रक्षा के लिए स्वयं माया रचते हैं, और अन्याय कितना भी बलवान क्यों न हो, धर्म की विजय अवश्यम्भावी है।