
कृष्ण जन्म — जन्माष्टमी की रात, बेड़ियाँ खुलना और पहरेदारों का सोना
Krishna Janm — Janmashtami Ki Raat, Bediyan Khulna Aur Pahredaron Ka Sona
जब पृथ्वी अधर्म के भार से पीड़ित हो उठी और सज्जनों की करुण पुकार आकाश तक गूँजने लगी, तब स्वयं परमात्मा ने भूतल पर अवतरित होने का संकल्प किया। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि आयी, रोहिणी नक्षत्र का पवित्र योग बना, और मध्यरात्रि का वह दिव्य क्षण निकट आ पहुँचा जिसकी प्रतीक्षा युगों से हो रही थी। यही वह रात्रि थी जिसे संसार आज "जन्माष्टमी" के नाम से पूजता है।
उस रात्रि प्रकृति स्वयं मानो शुभ संकेत दे रही थी। दिशाएँ स्वच्छ और निर्मल हो उठीं, आकाश में तारे स्निग्ध प्रकाश से चमकने लगे, यमुना की लहरें कोमल हो गयीं, और मंद-सुगन्धित वायु बहने लगी। ऋषि-मुनियों के मन प्रसन्न हो उठे, देवताओं ने आकाश से पुष्प-वर्षा की, और गन्धर्व-अप्सराओं का मंगलगान वातावरण में घुल गया। समस्त सृष्टि मानो अपने स्वामी के स्वागत के लिए साँस रोके खड़ी थी।
उसी पावन मध्यरात्रि में, मथुरा के अंधकारमय कारागार में, देवकी की कोख से भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए। पहले उन्होंने अपने अलौकिक चतुर्भुज रूप में — शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये — देवकी और वसुदेव को दर्शन दिये। उनके दिव्य तेज से वह अंधेरी कोठरी प्रकाश से भर उठी। माता-पिता ने हाथ जोड़कर उस परमात्मा की स्तुति की, जो उनके पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। तब प्रभु ने अपने पूर्वजन्मों का रहस्य बताकर, माता की ममता की रक्षा हेतु, अपने उस अद्भुत रूप को समेटकर एक कोमल, सुन्दर नवजात शिशु का स्वरूप धारण कर लिया।
प्रभु के प्राकट्य के साथ ही कारागार में अद्भुत घटनाएँ घटने लगीं। जो पहरेदार सतर्क खड़े थे, वे सहसा गहरी निद्रा में डूब गये। द्वारों के भारी ताले स्वयं खुल गये और लौह-कपाट बिना किसी आहट के खुल पड़े। वसुदेव के हाथों-पैरों में जकड़ी हुई कठोर बेड़ियाँ अपने आप खुलकर गिर पड़ीं। मानो सारी सृष्टि प्रभु की इच्छा के आगे नतमस्तक होकर उनके मार्ग को निष्कंटक बना रही थी।
तब भगवान की वाणी वसुदेव के हृदय में प्रेरणा बनकर उतरी — "हे पिता! इस शिशु को उठाकर गोकुल में नन्द के घर पहुँचा दो, जहाँ इसी रात्रि यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया है। उस कन्या को यहाँ ले आओ।" वसुदेव विस्मय और आनंद से भर उठे। उन्होंने उस दिव्य शिशु को एक टोकरी में कोमलता से रखा और अपने सिर पर उठाकर कारागार से बाहर की ओर चल पड़े। किसी ने उन्हें न रोका, किसी की आँख न खुली — यह सब प्रभु की योगमाया का ही खेल था।
इस प्रकार जिस कंस ने वर्षों तक कठोर पहरे और लोहे की बेड़ियों से देवकी-वसुदेव को बाँध रखा था, उसकी समस्त सतर्कता प्रभु के एक संकल्प मात्र से व्यर्थ हो गई। अत्याचारी की शक्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह ईश्वर की इच्छा के सामने तिनके के समान है।
इस लीला की महिमा यही है कि जब हृदय की कोठरी में प्रभु का प्राकट्य होता है, तब अज्ञान की बेड़ियाँ स्वयं टूट जाती हैं और अन्धकार का पहरा सदा के लिए सो जाता है। जन्माष्टमी की यह रात्रि हर भक्त को यही आश्वासन देती है कि प्रभु सदैव अपने भक्तों के बन्धन काटने आते हैं।